ब्लॉगसेतु

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--सालगिरह पर ब्याह की, पाकर शुभसन्देश।जीवन जीने का हुआ, सिन्दूरी परिवेश।।--कर्म करूँगा तब तलक, जब तक घट में प्राण।पा जाऊँगा तन नया, जब होगा निर्वाण।।--आना-जाना ही यहाँ, जीवन का है मर्म।वैसा फल मिलता उसे, जैसे जिसके कर्म।।--चुनकर गंगा घाट पर, पत्थर रहा तराश।किसी मोड...
अनीता सैनी
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हृदय पर अनहोना आभास सीये, यथार्थ के नर्म नाज़ुक तार पर, दबे पाँव दौड़ती है दावाग्नि-सी, ख़ुशबू-सी उड़ती है विश्वास पर, आहट होती है उजली आस पर  |चलती है एहसास की थामे अँगुली,  अचल अंबर-सा लिये हाथ में हाथ, सवार रहती है प...
कुमार मुकुल
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कैंसर सर्वाइवर सोनू पर लिखी किताब की भूमिकाकुमार मुकुल से मेरी मुलाकात कविता के पुल पर हुई थी जिसे हम दोनों ने मिलकर बनाया था - पटना के सीटीओ के प्रेस रूम में, पत्रकार मित्र प्रियरंजन भारती की पहल पर । मैंने एक ग़़ज़़ल के कुछ अशआर सुनाए थे और मुकुल जी ने पहाड़ शीर्...
अनीता सैनी
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क्यों नहीं कहती झूठ है यह सब,  तम को मिटाये वह रोशनी हो तुम,   पलक के पानी से जलाये  दीप,  ललाट पर फैली स्वर्णिम आभा हो तुम,  संघर्ष से कब घबरायी ? मेहनत को लाद कंधे पर,  जीवन के हर पड़ाव पर...
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 बिना किसी हथियार के, करते हैं सब वार।देखो कितना मुक्त है, आभासी संसार।।--बिना किसी आकार के, लगता जो साकार।सपनों में सबके बसे, आभासी संसार।।--बिना किसी सम्बन्ध के, भावों का संचार।अनुभव करते हृदय से, आभासी...
 पोस्ट लेवल : दोहे आभासी संसार
sanjiv verma salil
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कार्यशालाआइये! कविता करें ६ :.मुक्तक आभा सक्सेनाकल दोपहर का खाना भी बहुत लाजबाब था, = २६अरहर की दाल साथ में भुना हुआ कबाब था। = २६मीठे में गाजर का हलुआ, मीठा रसगुल्ला था, = २८बनारसी पान था पर, गुलकन्द बेहिसाब था।। = २६लाजवाब = जिसका कोई जवाब न हो, अतुलनीय, अनु...
kumarendra singh sengar
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तकनीकी रूप से कई बार आभास होता है कि हम बहुतों से बहुत पीछे हैं, बहुत पिछड़े हैं. हमारे साथ के ही बहुत से लोग हमसे कई सालों पहले से कंप्यूटर का उपयोग करने लगे थे. हमने पहली बार कंप्यूटर का आंशिक उपयोग शायद 1999 में करना शुरू किया था. हालाँकि देखने और छूने को तो सन 1...
sanjiv verma salil
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कार्यशालादोहा से कुण्डलिया*दोहा- आभा सक्सेना दूनवीपपड़ी सी पपड़ा गयी, नदी किनारे छांव।जेठ दुपहरी ढूंढती, पीपल नीचे ठांव।।रोला- संजीव वर्मा 'सलिल'पीपल नीचे ठाँव, न है इंची भर बाकीछप्पन इंची खोज, रही है जुमले काकीसाइकल पर हाथी, शक्ल दीदी की बिगड़ीपप्पू ठोंके ताल, सलिल...
sanjiv verma salil
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कार्यशाला कुण्डलिया दोहा- आभा सक्सेना रदीफ़ क़ाफ़िया ढूंढ लो, मन माफ़िक़ सरकार| ग़ज़ल बने चुटकी बजा, हों सुंदर अशआर||रोला- संजीव वर्मा 'सलिल'हों सुंदर अशआर, सजें ब्यूटीपार्लर में।मोबाइल सम बसें, प्राण लाइक-चार्जर मेंदिखें हैंडसम खूब, सुना भगे माफियाजुमलों की बरसात, करेगा...
sanjiv verma salil
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कार्य शाला:दोहा से कुण्डलिया *बेटी जैसे धूप है, दिन भर करती बात।शाम ढले पी घर चले, ले कर कुछ सौगात।।  -आभा सक्सेना 'दूनवी' लेकर कुछ सौगात, ढेर आशीष लुटाकर।बोल अनबोले हो, जो भी हो चूक भुलाकर।। रखना हरदम याद, न हो किंचित भी हेटी। जा...