ब्लॉगसेतु

Nitu  Thakur
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नवगीत आपका आभास नीतू ठाकुर 'विदुषी'मापनी~~ 14/14 फिर पलक झुक कर निहारेआपका आभास पाकरगूँजती है मौन वाणीफिर अधूरा गीत गाकर1अंतरे में तुम समायेगीत की रसधार फूटीतन बिना मन के मिलन सेइस जगत की रीत टूटीमोड़ते हैं मुख जहाँ सेहम दुखों पर मुस्कुराकर2फूल से चुभ...
Bhavana Lalwani
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लड़की एक  बार फिर से उसी  झील के किनारे बैठी है।  पानी में पैर  डुबोने  और छप  छप करें , का ख्याल आया लेकिन गंदले और काई जमे किनारे ने उसे दूर से ही छिटका दिया। पानी अब बहुत दूर तक खिसक गया था , झील के किनारे वाला हिस्सा सूख गया लगता है...
Bhavana Lalwani
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"ऐ मन्नू, मुझे देर हो जाएगी,  तू ये पैकेट रख।  मुझे शाम को दे देना। "" क्या है इसमें ? चूड़ियां !!!  ये औरतों की चीज़ें मैं कहाँ रखूं ? तू ले जा। ""मुझे देर हो रही ऑफिस के लिए , वहाँ ड्यूटी पर कहाँ रखूंगी।  तू रख, शाम को बस स्टैंड पर पकड़ा देना।&nb...
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--सालगिरह पर ब्याह की, पाकर शुभसन्देश।जीवन जीने का हुआ, सिन्दूरी परिवेश।।--कर्म करूँगा तब तलक, जब तक घट में प्राण।पा जाऊँगा तन नया, जब होगा निर्वाण।।--आना-जाना ही यहाँ, जीवन का है मर्म।वैसा फल मिलता उसे, जैसे जिसके कर्म।।--चुनकर गंगा घाट पर, पत्थर रहा तराश।किसी मोड...
अनीता सैनी
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हृदय पर अनहोना आभास सीये, यथार्थ के नर्म नाज़ुक तार पर, दबे पाँव दौड़ती है दावाग्नि-सी, ख़ुशबू-सी उड़ती है विश्वास पर, आहट होती है उजली आस पर  |चलती है एहसास की थामे अँगुली,  अचल अंबर-सा लिये हाथ में हाथ, सवार रहती है प...
कुमार मुकुल
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कैंसर सर्वाइवर सोनू पर लिखी किताब की भूमिकाकुमार मुकुल से मेरी मुलाकात कविता के पुल पर हुई थी जिसे हम दोनों ने मिलकर बनाया था - पटना के सीटीओ के प्रेस रूम में, पत्रकार मित्र प्रियरंजन भारती की पहल पर । मैंने एक ग़़ज़़ल के कुछ अशआर सुनाए थे और मुकुल जी ने पहाड़ शीर्...
अनीता सैनी
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क्यों नहीं कहती झूठ है यह सब,  तम को मिटाये वह रोशनी हो तुम,   पलक के पानी से जलाये  दीप,  ललाट पर फैली स्वर्णिम आभा हो तुम,  संघर्ष से कब घबरायी ? मेहनत को लाद कंधे पर,  जीवन के हर पड़ाव पर...
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 बिना किसी हथियार के, करते हैं सब वार।देखो कितना मुक्त है, आभासी संसार।।--बिना किसी आकार के, लगता जो साकार।सपनों में सबके बसे, आभासी संसार।।--बिना किसी सम्बन्ध के, भावों का संचार।अनुभव करते हृदय से, आभासी...
 पोस्ट लेवल : दोहे आभासी संसार
sanjiv verma salil
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कार्यशालाआइये! कविता करें ६ :.मुक्तक आभा सक्सेनाकल दोपहर का खाना भी बहुत लाजबाब था, = २६अरहर की दाल साथ में भुना हुआ कबाब था। = २६मीठे में गाजर का हलुआ, मीठा रसगुल्ला था, = २८बनारसी पान था पर, गुलकन्द बेहिसाब था।। = २६लाजवाब = जिसका कोई जवाब न हो, अतुलनीय, अनु...
kumarendra singh sengar
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तकनीकी रूप से कई बार आभास होता है कि हम बहुतों से बहुत पीछे हैं, बहुत पिछड़े हैं. हमारे साथ के ही बहुत से लोग हमसे कई सालों पहले से कंप्यूटर का उपयोग करने लगे थे. हमने पहली बार कंप्यूटर का आंशिक उपयोग शायद 1999 में करना शुरू किया था. हालाँकि देखने और छूने को तो सन 1...