ब्लॉगसेतु

विजय राजबली माथुर
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स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )  संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
sanjiv verma salil
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आभारआपसे शुभ कामना पा, हुआ यह दिन ख़ाससाँस में अमृत घुला ज्यों, सुमन में सुवासईश्वर दे पात्रता, बढ़ता रहे नित स्नेहज्यों की त्यों चादर रहे, जब जाऊँ अपने गेहह्रदय से आभार प्रिय! अनमोल है यह प्यारजिंदगी के द्वार पर है यही बन्दनवार    http://divyanarmada....
 पोस्ट लेवल : abhar आभार
Yashoda Agrawal
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मन बगिया सुख दुख के पुष्प साथ खिलते -*-खिला गुलाब कांटों बीच मुस्काता जीना सिखाता -*-जीवन रीत तप के ही मिलते सोने से दिन ..!!!-*-आशा की डोरी हौंसलों के मनके पिरोई जीत -*-बेटी की हँसी महके अंगनारा फूलो...
 पोस्ट लेवल : हाईकू अनुभूति आभा खरे
विजय राजबली माथुर
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स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )   संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
PRABHAT KUMAR
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सुनो, तैयार रहना जोखिमों को ढोने के लिएभागने वाले तो इतिहास में भी कलंकित होते हैं।  -------------------------------हाँ उनके नाम में फीमेल होने की खुशबू आती है। वो अपना सेक्स फेसबुक पर बयाँ करती भी नहीं हैं। उनकी फ्रेंड सूची में अपोजिट सेक्स वालों यानी मेल क...
 पोस्ट लेवल : चिंतन आभासी दुनिया
sanjiv verma salil
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ॐ दोहा शतकआभा सक्सेना 'दूनवी' * जन्म:आत्मजा:जीवन साथी:शिक्षा:लेखन विधा:प्रकाशन:उपलब्धि:संप्रति:संपर्क: ॐ दोहा शतक *चित्रगुप्त प्रभु! आइए, मन-मंदिर में नाथ।सत-शिव-सुंदर लेखनी, रचे उच्च हो माथ।।*टिप-टिप बूँदों की हुई, जब प्रिय बिन&n...
विजय राजबली माथुर
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sanjiv verma salil
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मुक्तक *स्नेह का उपहार तो अनमोल हैकौन श्रद्धा-मान सकता तौल है? भोग प्रभु भी आपसे ही पा रहेरूप चौदस भावना का घोल है*स्नेह पल-पल है लुटाया आपने।स्नेह को जाएँ कभी मत मापनेसही है मन समंदर है भाव काइष्ट को भी है झुकाया भाव ने*फूल अंग्रेजी का मैं,यह जानताफूल हि...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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              कल (28-10-2017)   "हिंदी आभा*भारत" ब्लॉग का एक वर्ष मुकम्मल हुआ। उपलब्धियों के नाम पर ज़्यादा कुछ नहीं है बताने के लिए बस इतना ही ब्लॉगिंग ने मुझे नई दिशा दी है लेखन में निखार लाने हेतु। इससे पहले लेखन आकाशव...
sanjiv verma salil
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मुक्तक एक-रचनाकार दो *बुझी आग से बुझे शहर की, हों जो राख़ पुती सी रातें दूर बहुत वो भोर नहीं अब, जो लाये उजली सौगातें - आभा खरे, लखनऊ सभी परिंदों सावधान हो, बाज लगाए बैठे घातें रोक सकें सरकारों की अब, कहाँ रहीं ऐसी औकातें? - संजीव, जबलपुर*http://...