ब्लॉगसेतु

Rajeev Upadhyay
116
हमारे बाप-दादे भी कैसे घामड़ थे जो मक्खन खाते थे। बताइए, मक्खन भी कोई खाने की चीज है! खट्टी-खट्टी डकारें आती हैं। पेट तूंबे की तरह फूल जाता है और गुड़गुड़ाने लगता है - कि जैसे अली अकबर सरोद बजा रहे हों या कोई भूत पेट के भीतर बैठा हुक्का पी रहा हो। और वायु तो इतनी बनत...
 पोस्ट लेवल : आलेख अमृत राय
रविशंकर श्रीवास्तव
4
..............................
 पोस्ट लेवल : आलेख ललित निबंध
दिनेशराय द्विवेदी
27
उम्र का 14वाँ साल था। नाक और ऊपरी होठ के बीच रोआँली का कालापन नजर आने लगा था। एक दम सुचिक्कन चेहरे पर काले बालों वाली रोआँली देख कर अजीब सा लगने लगा था। समझ नहीं आ रहा था कि इस का क्या किया जाए। स्कूल में लड़के मज़ाक बनाने लगे थे कि मर्दानगी फूटने लगी है, अब लड़किय...
रविशंकर श्रीवास्तव
4
..............................
 पोस्ट लेवल : आलेख
Rajeev Upadhyay
116
शीर्षक में यह स्वीकार कर लिया गया है कि लेख का विषय 'साहित्य-बोध' है; पर वास्तव में इस अर्थ में इसका प्रयोग चिंत्य है। यह मान भी लें कि लोक-व्यवहार बहुत से शब्दों को ऐसा विशेष अर्थ दे देता है जो यों उनसे सिद्ध न होता, तो भी अभी तक ऐसा जान पड़ता है कि समकालीन संदर्...
रविशंकर श्रीवास्तव
4
..............................
 पोस्ट लेवल : आलेख
रविशंकर श्रीवास्तव
4
..............................
 पोस्ट लेवल : आलेख
रविशंकर श्रीवास्तव
4
..............................
 पोस्ट लेवल : आलेख
रविशंकर श्रीवास्तव
4
..............................
 पोस्ट लेवल : आलेख
रविशंकर श्रीवास्तव
4
..............................
 पोस्ट लेवल : आलेख