ब्लॉगसेतु

रवीन्द्र  सिंह  यादव
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आम की फली हुईं अमराइयों मेंकोयल का कुहू-कुहू स्वर आज भी उतना ही सुरीला सुनाई दे रहा हैमयूर भी अपने नृत्य की इंद्रधनुषी आभा से मन को मंत्रमुग्ध करता दिखाई दे रहा हैतितली-भंवरे मधुवन में अपने-अपने मंतव्य ढूँढ़ रहे...
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--मदहोश निगाहें हैं, खामोश तराना हैमासूम परिन्दों को, अब नीड़ बनाना है--सूखे हुए शजरों ने, पायें हैं नये पत्तेबुझती हुई शम्मा को, महफिल में जलाना है--कुछ करके दिखाने का, अरमान हैं दिलों मेंउजड़ी हुई दुनिया को, अब फिर से बसाना है--...
अनीता सैनी
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अनुसरण से आचरण में ढली इंसान में एकनिष्ठ  सदभाव हूँ। दग्धचित्त पर शीतल बौछार  सरिता-सा प्रवाह इंसानीयत हूँ। निराधार नहीं अस्तित्त्व में लीन पुण्यात्मा  से बँधी करुणा हूँ। मधुर शब्द नहीं कर्म में समाहित नैनों से झलकत...
S.M. MAsoom
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मुझे याद आ गया ३०-३२ साल पुराना वो दिन जब मैं मुंबई में नया नया था , इलाकों के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी | बस एक दिन बैंक से निकला और मुंबई के कमाठीपुरा के पीला हाउस वाली सड़क में चल पड़ा इरादा था की मुंबई सेंट्रल की तरफ जा के देखा जाय कैसा इलाका है | उस...
Ravindra Pandey
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लाचार किस कदर से, हो गया है इंसान।सूनी पड़ी हैं  सड़कें, आबाद  है  श्मशान।आया ये दौर कैसा, दुनिया है बदहवाश।धरती पे उतर आया, कहाँ से  ये शैतान।धड़कन सहम गई हैं, साँसें  गई  हैं थम।अमेरिका हो इटली, क्या चीन या ईरान।बने रहें सजग हम, यही वक़्...
अनीता सैनी
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अदब से आदमी,आदमी होने का ओहदा, आदमीयत की अदायगी आदमी से  करता,  आदमी इंसानियत का लबादा पहन,  स्वार्थ के अंगोछे में लिपटा इंसान बनना चाहता  |सूर्य के तेज़-सी आभा मुख मंडल पर सजा,  ज्ञान की धारा का प्रारब्धकर्ता कहलाता,&nbs...
अनीता सैनी
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 दायरे में सिकुड़ रही स्वतंत्रता, पनीली कर सकूँ ऐसा नीर कहाँ से लाऊं ? कविता सृजन की आवाज़  है चिरकाल तक जले,  कवि हृदय में वो आग कैसे जलाऊं ? समझा पाऊँ शोषण की परिभाषा,  ऐसा तर्क कहाँ  से लाऊं  ? स्वार्थ के...
ANITA LAGURI (ANU)
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पूरी पृथ्वी में मानव जाति ही जीवित जीवों में &#23...
अनीता सैनी
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आहत हुए अल्फ़ाज़ ज़माने की आब-ओ-हवा में,  लिपटते रहे  हाथों  में और  सीने में उतर गये, अल्फ़ाज़ में एक लफ़्ज़ था मुहब्बत, ज़ालिम ज़माना उसका साथ छोड़ गया,   मुक़द्दर से झगड़ता रहा ता-उम्र वह,  मक़ाम मानस अपना बदलता गया,&nbs...
विजय राजबली माथुर
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 Kashish News Sep 27, 2018 हमर बिहारसभ्यता की शुरुआत और अंत का मिलनः अनिता गौतमपटनाः कहते हैं सभ्यता की शुरुआत में लोग नंगे रहते थे, इंसान और जानवरों की जिंदगी में कोई फर्क नहीं था। समय के साथ सब कुछ सभ्य और सुव्यवस्थित होता गया। यौन उत्पीडन से बचाव...