ब्लॉगसेतु

ज्योति  देहलीवाल
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''शिल्पा बेटा, आज अंकित काम पर नहीं आया हैं। ये ले एक्टिवा की चाबी और घर जाकर मेरा टिफिन लेकर आ।'' कपड़े के दुकानदार ने अपने दुकान की सेल्स गर्ल से कहा। शिल्पा पेशोपेश में पड़ गई। मालिक को मना नहीं कर सकती थी और मालिक के घर जाने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी। कारण था...
Nitu  Thakur
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हे मृगनयनी , गजगामिनी, त्याग के तुम श्रृंगार  अपने रक्षण हेतु लो हाथों में तलवारना जाने किस वेश में दुश्मन कर दे घात जैसे माता जानकी फसी दशानन हाथ  मत सोचो रक्षण हेतु श्री रामचंद्र जी आएंगे अग्निपरीक्षा लेकर भी तुमको वनवास पठायेंग...
सुनील  सजल
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लघुकथा- समर्पणवह छः माह बाद अपने गाँव लौटा था । मजदूरी के चक्कर में पूरे परिवार सहित पलायन कर जबलपुर चला गया था । " रमलू कब लौटा ?" किसी ने उससे पूछा ।" आज ही गुरूजी ।" उसका उत्तर ।"एक बात पूछ सकता हूँ "। गुरूजी का प्रश्न ।"क्यों नहीं गुरूजी ।बेशक पूछिए ।"रमलू...
Yashoda Agrawal
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                  "मैं चुप नहीं रहूँगी"                       मोनिका की जब आंख खुली तब उसका शरीर बुरी तरह टूट रहा था । कुछ अजीब सा एहसास होने पर उसने अपने...
जन्मेजय तिवारी
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                  वह जैसे ही ढाबों के सामने पहुँचा, ढाबे वाले उस पर टूट पड़े । उसे लगा कि उसकी खुशी के भी फूट पड़ने का यही वक्त है । क्यों न लपककर दोनों हाथों से इस वक्त को ही लूट लूँ । वह लूटने के लिए थोड़ा और...
सुशील बाकलीवाल
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          गांव के लल्लन महाराज की 84 साल की माताजी का स्वर्गवास हो गया । तेरहवी में भोज का इंतेज़ाम हुआ, बंता हलवाई तरह-तरह के पकवान बनवा रहा था ।  मोहनथाल, पूरी, कचोरी, खाजा, लड्डू की सुगंध फ़िज़ाओं में बिखर रही थी ।...
जन्मेजय तिवारी
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                   सुबह से ही करीमन की दुकान पर भीड़ उमड़ने लगी थी । आस-पास के सभी लोग तो लेट-लतीफ ट्रेनों की तरह काफी पीछे चल रहे थे । उनके लिए तो उसकी दुकान पर जाना रोजमर्रा की ही बात थी । उन्हें लगा कि रोज व...
जन्मेजय तिवारी
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                     चूहों की सालाना आम बैठक आहूत की गई थी । तमाम पदाधिकारी और सिविल सोसायटी के चूहे अपने-अपने तर्कों-कुतर्कों के साथ अपने लिए निर्धारित सीटों पर ठसक और कसक के साथ शोभा को प्राप्त हो रहे थे...
जन्मेजय तिवारी
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                            अगले दिन अवकाश होने पर रात को यह दृढ़ संकल्प लेकर सोया कि कल देर तक नींद का सुख लूटूँगा, पर सुबह मुँह अँधेर...
सुशील बाकलीवाल
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मैं पैसा हूँ...            मुझे आप मरने के बाद ऊपर नहीं ले जा सकते, मगर जीते जी मैं आपको बहुत ऊपर ले जा सकता हूँ ।मैं पैसा हूँ...            मुझे पसंद करो...