ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
150
पता नहीं, जब मैंने इस तस्वीर को देखा, तबसे किन भावों से भर गया हूँ। इसे पल-पल अपने अंदर उतरते देना है। इसके बाद भी नहीं समझ नहीं पा रहा, यह क्या है? सोचता हूँ, तस्वीरें कितनी यात्राएं करती हैं। यह कहाँ से चली होगी। किस कैमरे से किसने कहाँ खींची होगी। कितने सालों ब...
Shachinder Arya
150
उस वक़्त उसकी काँख में कोई बाल नहीं था, जब पहली बार उसने उसे वहाँ चूमने के साथ अपनी दूसरी प्रेमिका की याद को विस्मृत करते हुए वह तस्वीर खींची थी। दोनों अभी एक-दूसरे के लिए नए-नए साथी बने हैं। वह अकसर अपनी सहेलियों से सुनती रहती। लड़कियों का ‘सेफ़ डिपॉज़िट’। वह उसकी एफ़ड...
Shachinder Arya
150
तीसरी मंज़िल। सबसे ऊपर। इसके ऊपर आसमान। आसमान में तारे। अँधेरे का इंतज़ार करते। इंतज़ार चीलों के नीचे आने तक। वह वहाँ तब नहीं देख पाती, चमगादड़ों की तरह। इन्हे आँख नहीं होती देखने के लिए। वह तब भी नहीं छू जाते कभी किसी पत्ते को भी। हरे-हरे पत्ते। तुम्हारे गाल की तरह म...
Shachinder Arya
150
उसमें बहुत सारी चीज़ें या तो अपने आप गुम हो गई हैं या गुम कर दी गयी हैं। चीजों का न दिखना अकसर हमें ऐसा ही करता जाता है। लगता है, ऐसा बहुत कुछ था जो दिख नहीं रहा, उसे कौन कहेगा। मैंने ऐसा जान बूझकर नहीं किया। कभी हो जाता हो, तो पता नहीं। इसने कहीं से भी शहर को ढक नह...
Shachinder Arya
150
ड्राफ़्ट में देखा तो तारीख़ आठ मार्च दो हज़ार तेरह की है। उसके साल भर पहले, आठ मार्च के दिनशहर के शहर बने रहने की स्त्री व्याख्या  लिखी थी, तभी समझ गया था, स्त्री-पुरुष दोनों एकसाथ चलते हुए किसी भी निर्मिति को बनाते हैं। भले हम उसके अलग-अलग पाठ बनाते जाएँ, पर वह...
Shachinder Arya
150
मैं लिखना चाहता हूँ वह शब्द, जो आज से पहले कभी किसी ने नहीं लिखे हों। वह एहसास जो किसी ने न महसूस किए हों। कहीं से भी ढूँढ़ना पड़े, उन्हे खोजकर ले आऊँगा। उन्हें ढूँढ़ने में कितना भी वक़्त बीत जाए, पर वह मिल जाएँ, एकबार। कभी मन करता है, बस ऐसे ही उनकी तरह गुम होते रहना...
Shachinder Arya
150
एक बात साफ़ तौर पर मुझे अपने अंदर दिखने लगी है। शायद कई बार उसे कह भी चुका हूँ। शब्द भले वही नहीं रहते हों पर हम अपनी ज़िंदगी के भीतर से ही कहने की शैली ईज़ाद करते हैं। वह जितना हमारे भीतर से आएगी, उनती सघनता से वह दूसरों को महसूस भी होगी। इसे हम एक तरह की कसौटी भी मा...
Shachinder Arya
150
पता नहीं वह उस पल के पहले किन ख़यालों से भर गया होगा। यादें कभी अंदर बाहर हुई भी होंगी? बात इतनी पुरानी भी नहीं है। कभी-कभी तो लगता अभी कल ही की तो है। दोनों एक वक़्त पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर खड़े, अपने आगे आने वाले दिनों के खवाबों ख़यालों में अनदेखे कल के सपने ब...
Shachinder Arya
150
आज कल यह तर्क बहुत चल रहा है कि जनता भी विरोध दर्ज़ करना चाहती है, पर उसके पास सुघड़ भाषा और उसकी पिच्चीकारी करती मुहावरेदार शैली नहीं है। वह सब, जो इसकी ओट में पीछे खड़े हैं, इस बहाने से आम जनता के प्रवक्ता बनकर उभरे हैं। वह ख़ुद इस पद पर नियुक्त कर लिए गए हैं। यह संग...
Shachinder Arya
150
जब कुछ दिन रुक जाओ तब ऐसे ही होता है। कितनी बातें एक साथ कहने को हो आती हैं। जबकि मन सबको धीरे से कह चुका है, कह देंगे इतमिनान से। पर कौन मानने वाला है। कोई नहीं मानता। कभी-कभी जब अपने चारों तरफ़ देखता हूँ तो लगता है, उन सबमें सुस्त क़िस्म का रहा होऊंगा। कछुए जैसा। त...