ब्लॉगसेतु

सुनीता शानू
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तुम जब भी उदास होते हो मै उन वजहों को खोजने लगती हूँ जो बन जाती है तुम्हारी उदासी की वजह और उन ख़ूबसूरत पलों को याद करती हूँ जो मेरी उदासी के समयतुमने पैदा किये थेमुझे हँसाने व रिझाने के लियेकाश! कभी तो मिटेंगे एक साथ ये उदासी के काले बादलज...
 पोस्ट लेवल : उदासी कविता रिश्ते
Bhavna  Pathak
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क्यों उदास बैठे हो ऐसेक्यों छाया इतना सन्नाटाटूट गया तुमसे कुछ गिरकरपड़ा गाल पर मां का चांटाहोमवर्क कर पाए ना जबटीचर ने स्कूल में डांटाहल्का  हो जाता है हर दुखमित्रों से यदि उसको बांटाआओ चलो पार्क में खेलेंकहो उदासी को अब टाटा-----------  शिवशंकर
सुशील बाकलीवाल
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          जैसा कि तस्वीर मे दिखाया गया है उस से आपको हाथ की उंगलियों के नाम पता चल गये होंगे ।सबसे पहले तर्जनी की बात...          अगर यह उंगली सीधी है, कहीं से भी टेडापन नहीं...
Shachinder Arya
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अभी जब से सो कर उठा हूँ, तब से पता नहीं किन अजीब-अजीब से ख़यालों से भर गया हूँ। कैसे इन विकृत से बेढंगे सवालों ने मुझे घेर लिया। ऐसा क्यों होता है, हम न चाहते हुए भी लिखने को मज़बूर हो जाते हैं। कहाँ खाली बैठा रहता। कुछ सोचता। कुछ बैठा रहता। सोचता भी शायद यही सब। या...
Shachinder Arya
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वह एकदम शांत क़िस्म की दीवारों वाला घर था। छिपकली भी आहिस्ते से उनसे चिपकी रहती और कोई जान भी न पाता। जाले दरवाज़े के पीछे छिपकर सालों से वहीं बने हुए थे। पलस्तर धीरे-धीरे अम्मा की अधीर आँखों की तरह उखड़ रहा था। सफ़ेदी को सीलन के साथ पपड़ी बने ज़माना बीत गया, किसी को को...
Shachinder Arya
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हम कभी नहीं सोचते, पर हो जाते हैं। कितने दोस्त बन जाते, इसी सब में। पर फ़िर भी हम तो दोस्त उसी के बनना चाहते। मन मार लेते। सब साथ दिखते। पर हम उसके साथ होना चाहते। कुछ न बोलते हुए भी सब बोल जाते। पर वह कहीं न होती। हम कहीं न होते। जगहें वहीं रह जातीं। हम हम नहीं रह...
Shachinder Arya
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हज़रत निज़ामुद्दीन घंटा भर पहले पहुँचकर वह क्या-क्या कर सकता है, इसकी लिस्ट वह कई बार बनाकर मिटा चुका था। हर डूबती शाम, उसका दिल भी डूब जाता। जिस कमरे पर वह साल दो हज़ार दो से रह रहा था, उसे अपने ही गाँव के एक लड़के को दिलाकर एक ठिकाना बचाए रखने की ज़िद काम नहीं आई। हर...
Shachinder Arya
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पता नहीं कभी-कभी क्या होता है, हम चाहकर भी नहीं समझ पाते। शायद तभी उन बीत गए दिनों में लौट कर उन्हें दुरुस्त करने की ज़िद से भर जाते होंगे। अगर ऐसा न होता तब मुझे भी हलफ़नामे की तरह दोबारा उन बातों पर गौर करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। सोचता हूँ, अगर मेरे मन में वह ख़याल दो...
Shachinder Arya
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वर्माजी देखने में साधारण से मास्टरजी लगते हैं। जैसे विनोद कुमार शुक्ल की कविता से अभी-अभी बाहर निकले हों। जो उनके घर कभी नहीं आएँगे, वह उनसे मिलने उनके पास चले जायेंगे। पास पहुँचकर वह सिर्फ़ हालचाल लेंगे। और कुछ नहीं कहेंगे। ऐसे ही वे हमारे बचपन में मास्टर बनकर आए।...
Shachinder Arya
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जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती जाती है,  हम वापस अपने अंदर लौटने लगते हैं जैसे। जैसे कहीं अनजानी जगह फँसे रहने का एहसास अंदर-ही-अंदर चुभता रहता है। कोई बहाना होता, जो वापस ले जाता। पर बहाना ऐसा, जब हम खुश हो सकें। खुश होकर ख़ुद को देख सकें। ऐसा न हो जब हम लौटकर वापस...