ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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धूप-छाव सामने खिड़की से लगे शीशे के पार लगातार आँख-मिचौली खेलते दिखते रहे। उनका दिखना आँखों से नहीं रौशनी से है, जो बादलों को चीरकर अंदर तक दाखिल होती जाती। दुनिया उन लकड़ी के कब्जों  से बहुत दूर भी रही होगी, जो इस वक़्त दीवार से कहीं भागे जाने को नहीं दिख रहे। व...
Shachinder Arya
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इसे ढाबली कहते हैं, पर अभी बंद है। एक अरुण की भी है, पान की। वह बंद है, वह खुली है। जो ट्रॉली के बिलकुल पीछे खुली है,  वही बिसातखाना है। इसकी कहानी फ़िर कभी।
Shachinder Arya
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किसी खाली सुनसान स्टेशन के ‘प्लेटफ़ॉर्म’ की तरहउस अकेलेपन में इंतज़ार कर देखना चाहता हूँकैसा हो जाता होगा वह जब कोई नहीं होता होगाकोई एक आवाज़ भी नहींकहीं कोई दिख नहीं पड़ता होगाबस होती होगी अंदर तक उतरती खामोशीदूर तक घुप्प अँधेरे सा इंतज़ार करता ऊँघता ऊबताकि इस अँधेरे...