ब्लॉगसेतु

गौतम  राजरिशी
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एक और नया साल...उफ़्फ़ ! इस कमबख़्त वक्त को भी जाने कैसी तो जल्दी मची रहती है | अभी-अभी तो यहीं था खड़ा ये दो हज़ार अठारह अपने पूरे विराट स्वरूप में...यहीं पहलू में तो था ये खड़ा ! अचानक से जैसे पलकें झपकते ही अब दो हज़ार उन्नीस आ खड़ा हुआ है अपना विशाल सा मुख फाड़े | इतना...
गौतम  राजरिशी
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कितनी दूरी ! दूरी...कितनी दूर ! कितना दर्द कि बस उफ़ अब ! कितना शोर कि बहरी हों आवाज़ें और कितनी चुप्पी कि बोल उठे सन्नाटा ! कितनी थकन कि नींद को भी नींद ना आए...आह, कितनी नींद कि सारी थकन कोई भूल जाए ! कितनी उदासी कि खुशियाँ तरस जायें अपने वजूद को...कितनी खुशिय...
गौतम  राजरिशी
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[ कथादेश के सितम्बर 2018 के अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का अठारहवाँ पन्ना ]अभी कुछ दिन पहले डायरी के किसी बेतरतीब पन्ने से उलझे हुये एक पाठक का बहुत ही तरतीब सा कॉल आया था | बहुत देर बात हुई उनसे और डायरी के तमाम पन्नों से जुड़े उनके सवालों की फ़ेहरिश्त इतनी लम्...
गौतम  राजरिशी
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[ कथादेश के जून 2018 के अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का पंद्रहवाँ पन्ना ]इन्द्रजीत...लांस नायक इन्द्रजीत सिंह नहीं रहा | बटालियन के समस्त जवानों को यहाँ इस ढ़ाई साल की तयशुदा तैनाती के बाद वापस सकुशल ले जाने की माँ भवानी से की हुई मेरी प्रार्थना अनसुनी रह गयी |...
गौतम  राजरिशी
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हावड़ा से आने वाली राजधानी एक्सप्रेस ग़ज़ब ही विलंब से चल रही थी | इस बार की आयी बाढ़ कहीं रस्ते में रेल की पटरियों को भी आशिंक रूप से डुबो रही थी तो इस रस्ते की कई ट्रेनें धीमी रफ़्तार में अपने गंतव्य तक पहुँचने में अतिरिक्त समय ले रही थीं | गया स्टेशन पर प्रतीक्षारत य...
गौतम  राजरिशी
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ठक-ठक...ठक-ठक ! उम्र की नयी दस्तक सुनवाता हुआ मार्च का महीना हर साल कैसी-तो-कैसी अजब-ग़ज़ब सी अनुभूतियों की बारिश से तर-बतर जाता है पूरे वजूद को | शायद जन्म-दिवस वो इकलौता उपलक्ष्य होता है, जब हम किसी चीज़ के घटने का उत्सव मनाते हैं | उम्र बढ़ती है...कि घटती है ? छुटपन...
गौतम  राजरिशी
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[ कथादेश के फरवरी 2018 के अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का बारहवाँ पन्ना ]नये साल के मचलते यौवन की शरारत कुछ इस क़दर सर चढ़ कर बोलने लगी थी कि मौसम ने एकदम से गंभीर अभिभावक वाला चोगा पहन लिया है और मौसम के इस गंभीर अवतार ने रूखे-सूखे-हरे-भूरे पहाड़ों को भी धवल श्वे...
गौतम  राजरिशी
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हमारी नयी किताब आयी है | कहानियों की पहली किताब | हिन्दी-साहित्य में सेना और सैनिक हमेशा से एक अछूता विषय रहा है | गिनी-चुनी कहानियाँ हैं सैन्य-जीवन पर...गिने-चुने उपन्यास हैं | एक अदनी सी कोशिश है उसी कमी को थोड़ा कम करने की | कुछ कहानियाँ आपलोग इस ब्लौग पर पहले ही...
गौतम  राजरिशी
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[ कथादेश के जनवरी 2018 के अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का ग्यारहवाँ पन्ना ]नयी तारीख़ें अब उदास करती हैं | पहले नहीं करती थीं | तब...उन गुज़र चुके स्वप्न सरीखे बचपने में घड़ी की सुईयों को तेज़-तेज़ घुमा कर, कलेंडर के पन्नों को जल्दी-जल्दी पलट कर देख लेना चाहता था कि...
गौतम  राजरिशी
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[ कथादेश के दिसम्बर 2017 के अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का दसवाँ पन्ना ]कुहरे की तानाशाही शुरू हो चुकी है | सूरज की सत्ता को चुनौती देने की दिसम्बर की साजिश आख़िरकार रंग ले ही आई | कमबख्त़ दिसम्बर को कतई गुमान नहीं कि सूरज को चुनौती देने के फेरे में यहाँ सरहद क...