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शालिनी  रस्तौगी
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 औरत की आवाज़औरत की आवाज़ हूँ मैं , हमेशा से पुरज़ोर कोशिश की गई, मुझे दबाने की , हमेशा सिखाया गया मुझे ....... सलीका , कितने उतार-चढ़ाव के  साथ, निकलना है मुझे  | किस ऊँचाई तक जाने की सीमा है मेरी , जिसके ज्यादा ऊँची होने पर मैं, कर जाती हूँ प्रवेश बद...
 पोस्ट लेवल : कविता नज़्म
शालिनी  रस्तौगी
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अदृश्य दीवार  हाँ , दिखती तो नहीं आँखों के समक्ष कोई बंदिश, कोई बाड़, कोई दीवार ,साफ़-साफ़ दिखती है आमंत्रण देती दुनिया पास बुलाता उन्मुक्त खुला आकाश पर कदम बढ़ाते ही उड़ने को पंख फड़फड़ाते ही टकरा जाते हैं पाँव उलझने लगते हैं पंख आखिर क्या है वो जिससे टकरा लौट आते ह...
 पोस्ट लेवल : कविता नज़्म
शालिनी  रस्तौगी
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 आत्मनिर्भर औरतें जिन्हें अहसास दिलाया जाता है बार-बार , हर बार जब घर के भीतर कभी अपना सिर, अपनी आवाज़ उठाती हैं वो किसी बात पर अपना विरोध जताती हैं वो समझाया जाता है उन्हें घुमा-फिराकर कही बातों में कुछ स्पष्ट शब्दों में कुछ इशारो में .....देखो, इस चारदीवारी क...
 पोस्ट लेवल : कविता
सतीश सक्सेना
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अब और न कुछ कह  पाऊंगा, मन की अभिव्यक्ति मौन सही !कुछ लोग बड़े आहिस्ता सेघर के अंदर , आ जाते हैं !चाहे कितना भी दूर रहें ,दिल से न निकाले जाते हैं !ये लोग शांत शीतल जल मेंतूफान उठाकर जाते हैं !सीधे साधे मन पर, गहरे हस्ताक्षर भी कर जाते हैं !कहने...
शालिनी  रस्तौगी
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शालिनी  रस्तौगी
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 औरत की आवाज़ ~~~~~~~~~~औरत की आवाज़ हूँ मैं ,हमेशा से पुरज़ोर कोशिश की गई,मुझे दबाने की ,हमेशा सिखाया गया मुझे ....... सलीका ,कितने उतार-चढ़ाव के साथ,निकलना है मुझे | किस ऊँचाई तक जाने की सीमा है मेरी ,जिसके ज्यादा ऊँची होने पर मैं,कर जाती हूँ प्रवेश बदतमीज़ी की...
 पोस्ट लेवल : कविता
girish billore
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     भारतीय भाषाई साहित्य अंतरजाल पर जिस तरह विस्तार पा रहा है, उसकी कल्पना हमने हिंदी चिट्ठाकारी के प्रारंभिक दौर में कर ली थी। परंतु बहुत सारी लोगों को हमारा काम बेवकूफी से बढ़कर कुछ नहीं लग रहा था।    कुछ लोग हिंदी चिट्ठाकारी क...
सतीश सक्सेना
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जिससे रिश्ता जुड़ा था जनम जन्म से  द्वार पर आ गए , आज  बारात ले !उनके आने से, सब खुश नुमा हो गया !नाच गानों से , घर भी चहक सा गया !पर यह आँखें मेरी, संग नहीं दे रहीं हँसते हँसते न जाने छलक क्यों रहीं  ?आज बेटी ...
संगीता पुरी
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 अटल जी की कविता 1)गीत नहीं गाता हूँबेनक़ाब चेहरे हैं,दाग़ बड़े गहरे हैंटूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूँगीत नहीं गाता हूँलगी कुछ ऐसी नज़रबिखरा शीशे सा शहरअपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूँगीत नहीं गाता हूँपीठ मे छुरी सा चांदराहू गया रेखा फांदमुक्ति के...
 पोस्ट लेवल : अटल जी की कविता
अर्चना चावजी
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हम फिर से बच्चे बन जाएंआंगन में खेलें गिल्ली -डंडा,गोल गोल कांच की गोटियांछुप जाएं कपास की थप्पी में,खींच कर भागे एक दूसरे की चोटियांजब खूब थक जाएं तोबांट कर खा लें आधी आधी रोटियां...ऐ दोस्त दो मिनट के लिए ही सहीपर जरूर मेरे घर आना और हांअपना बचपन साथ लान...
 पोस्ट लेवल : कविता