ब्लॉगसेतु

ऋता शेखर 'मधु'
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 समय कठिन हैक्या कुंठा या क्या गिलाजो मिलना था वही मिलामन को खुशियों से भर लोसमय कठिन हैकिसने किसको क्या- क्या बोलाशब्द शब्द किसने है तोलामन को अब तो पावन कर लोसमय कठिन हैजिन बन्धु की याद हो आतीउनको झट से लिख दो पातीया फिर डायल नम्बर कर दोसमय कठिन हैयदि बाकी ह...
 पोस्ट लेवल : कविता सभी रचनाएँ
Roli Dixit
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 जब कभी गुज़रोगी मेरी गली सेतो मेरी पीड़ा तुम्हें किसी टूटे प्रेमी कासंक्षिप्त एकालाप लगेगीपूरी पीड़ा को शब्द देना कहाँ सम्भव?मैंने तो बस इंसान होने की तमीज़ को जिया हैअपनी कविताओं के ज़रिए...मन के गहन दुःख को जो व्यक्त कर सकेंवो सृजन करने का मुझमें साहस कहाँ?डूबते...
 पोस्ट लेवल : दुःख कविता
Lokendra Singh
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यूट्यूब चैनल 'अपना वीडियो पार्क' पर देखेंक्या किया पिता ने तुम्हारे लिए?तुमने साहस कहां से बटोराप्रश्न यह पूछने का।बचपन की छोड़ोतब की तुम्हें सुध न होगीजवानी तो याद है नतो फिर याद करो...पिता दफ्तर जाते थे साइकिल सेतुम्हें दिलाई थी नई मोपेडजाने के लिए कॉलेज।ऊंची पढ़...
Meena Bhardwaj
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                       नवनिर्माण की नींवऔर ऊसर सी जमीन परपूरी आब से इतरा रहे होकिसके प्रेम में हो गुलमोहरबड़े खिलखिला रहे होबिछड़े संगी साथीमन में खलिश तो रही होगीटूटी भावनाओं की किर्चेंतुम्हें चुभी जरूर हों...
 पोस्ट लेवल : कविताएँ
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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सिंधु तट पर एक सिंदूरी शाम गुज़र रही थीथी बड़ी सुहावनी  लगता था भानु डूब जाएगा अकूत जलराशि में चलते-चलते बालू पर पसरने का मन हुआ भुरभुरी बालू पर दाहिने हाथ की तर्जनी से एक नाम लिखा सिंधु की दहाडतीं...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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पृथ्वी की उथल-पुथल उलट-पलटकंपन-अँगड़ाई  परिवर्तन की चेष्टा कुछ बिखेरा कुछ समेटाभूकंप ज्वालामुखी बाढ़ वज्रपात सब झेलती है सहनशीलता से धधकती धरतीजीवन मूल्यों की फफकती फ़सल देख रहा है आकाश मरती &n...
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--नहीं जानता कैसे बन जाते हैं,मुझसे गीत-गजल।जाने कब मन के नभ पर,छा जाते हैं गहरे बादल।।--ना कोई कॉपी ना कागज,ना ही कलम चलाता हूँ।खोल पेज-मेकर को,हिन्दी टंकण करता जाता हूँ।।--देख छटा बारिश की,अंगुलियाँ चलने लगतीं है।कम्प्यूटर देखा तो उस पर,शब्द उगलने लगतीं हैं।।--नज...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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जेलों में  जिस्म तो क़ैद रहे  मगर जज़्बात  आज़ाद रहे महामूर्खों के  दिमाग़ की उपज  बेवक़ूफ़ कीड़े-मकौड़े  खाए जा रहे काँटों के बीच मनोमालिन्य से परे आशावान अंतरात्मा के पलते मीठे बेर   चीख़-चीख़करअपने पकने की म...
देवेन्द्र पाण्डेय
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मैने मांगा, जाड़े की धूपउसने दिया,घना कोहरा!मैने पूछा,"ठंडी कब जाएगी?"उसने कहा,"थोड़ी बर्फवारी होने दो।"मैने पूछा,"बसंत कहाँ है?"उसने कहा,"रुको! एक ग्लेशियर टूट जाने दो!"मैने कहा,"जाओ! तुमसे बात नहीं करते।"उसने कहा,"मित्र! तुमसे ही सीखी है यह शत्र...