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sanjiv verma salil
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: बाल कविता :संजीव 'सलिल'*आन्या गुडिया प्यारी,सब बच्चों से न्यारी।.गुड्डा जो मन भाया,उससे हाथ मिलाया।.हटा दिया मम्मी ने,तब दिल था भर आया।.आन्या रोई-मचली,मम्मी थी कुछ पिघली।.''नया खिलौना ले लो'',आन्या को समझाया।.शाम को पापा आएमम्मी पर झल्लाए।*हुई रुआँसी मम्मीआन्या न...
 पोस्ट लेवल : बाल कविता
Meena Bhardwaj
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एक मुद्दत के बादआईने की रेत हटा खुद के जैसाखुद की नजर सेतुमको देखापहली बार लगावक्त गुजरा कहाँ हैंवहीं थम गया है तुम्हारी पल्लू संभालतीअंगुलियों से लिपटाउजली धूप सी हँसी के साथ मानो कह रहा हो..गुजर जाऊँ मैं वो हस्ती नहींतह दर तह सिमटा युगों सेमैं तो य...
 पोस्ट लेवल : कविताएँ
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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देख रहा हूँ चींटियों कोकतारबद्ध चलते हुए कुछ जातीं चींटियाँ कुछ आतीं चींटियाँसोच रहा हूँ कितनी दिमाग़दार हैं चींटियाँएकता-शक्ति का अनुपम उदाहरण हैं चींटियाँअंडा ले बिल से निकल पड़ें तो कारण हैं चींटियाँ किसी सियासी सरहद से बेख़ब...
 पोस्ट लेवल : कविता चींटियाँ
sanjiv verma salil
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बाल कविता आन्या आन्या मचल गयी थी, मन में जिद थी ठाने।मना-मना सब हारे, बात न लेकिन माने। लगी बहाने आँसू, सिर पर गगन उठाया।मम्मी-पापा भैया, कोइ मना न पाया।आये नानी-नाना, बहुतेरा समझाया।आया को खुश करने, गुड्डा एक मँगाया।आन्या झूमी-नाची, ज...
 पोस्ट लेवल : बाल कविता आन्या
sanjiv verma salil
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गीत:प्रेम कविता...संजीव 'सलिल'**प्रेम कविता कब कलम सेकभी कोई लिख सका है?*प्रेम कविता को लिखा जाता नहीं है.प्रेम होता है किया जाता नहीं है..जन्मते ही सुत जननि से प्रेम करता-कहो क्या यह प्रेम का नाता नहीं है?.कृष्ण ने जो यशोदा के साथ पालाप्रेम की पोथी का उद्गाता वही...
 पोस्ट लेवल : गीत प्रेम कविता
Bharat Tiwari
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कवि राजेंद्र राजन जी की इन कविताओं को पढ़ने के बाद... कुछ कवि अपना धर्म निभा रहे हैं और बाकियों को कवि कहा, सोचा ही क्यों जाए! भरत एस तिवारी/ शब्दांकन संपादकआज का नीरो | न्याय | हौसला आफजाई | दूसराराजेंद्र राजनवैचारिक पत्रिका सामयिक वार्ता के पूर्व कार्यका...
Sumit Pratap Singh
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जब भी मैं जिंदगी से बेहद उदास हो जाता हूँतब मेरे दिमाग में ये ख्याल आता है किक्यों न खत्म कर लूँ खुद को और चला जाऊं इस दुनिया से बहुत दूरये सोचते-सोचते मुझेरास्ते में मिल जाता हैमंदिर पर भीख माँगने वाला दुर्घटना में अपनी दोनों टाँगें ग...
Meena Bhardwaj
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कुछ बातें ,कई बारबन जाती हैं वजूद की अभिन्न कर्ण के ...कवच-कुण्डल सरीखीअलग होने के नाम परकरती हैं तन और मन दोनों ही छलनीसर्वविदित हैशब्दों की मार ...इनको भी साधना पड़ता हैअश्व के समानतुणीर से निकले बाण हैं शब्द जो लौटते नहीं..जख़्म देते...
 पोस्ट लेवल : कविताएँ
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तितली आई! तितली आई!!रंग-बिरंगी, तितली आई।।कितने सुन्दर पंख तुम्हारे।आँखों को लगते हैं प्यारे।।फूलों पर खुश हो मँडलाती।अपनी धुन में हो इठलाती।।जब आती बरसात सुहानी।पुरवा चलती है मस्तानी।।तब तुम अपनी चाल दिखाती।लहरा कर उड़ती बलखाती।।पर जल्दी ही थक जाती हो।दीवारों...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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आम की फली हुईं अमराइयों मेंकोयल का कुहू-कुहू स्वर आज भी उतना ही सुरीला सुनाई दे रहा हैमयूर भी अपने नृत्य की इंद्रधनुषी आभा से मन को मंत्रमुग्ध करता दिखाई दे रहा हैतितली-भंवरे मधुवन में अपने-अपने मंतव्य ढूँढ़ रहे...