ब्लॉगसेतु

Rajeev Upadhyay
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उलझनें हर बार छटपटाहट में बदल जाती हैं और मन जैसे किसी कालकोठरी में हो बंद मुक्त होने का स्वप्न लेकर देता है दस्तक तेरे महल के दरवाजे पर लिखा है जहाँ शब्दों में बडे ‘कि अंदर आना मना है।'प्रतिबंध ही तो आसमान के दरवाजे को ढकेलकर उस पार क...
नई कलम
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चूहे की घड़ी ==========टिक टिक टिक कौन चूहा बैठा है मौन बिल्ली से नाराज़ है शैतानी से बाज़ है खाना भी ना खाया है मनाए उसे कौन...घड़ी चुरायी बिल्ली ने खरीदी थी जो दिल्ली में बिल्ली से ये डरता है गली में बनता डॉन...टिक...
Roli Dixit
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उस रोज़जब पतझड़ धुल चुका होगाअपनी टहनियों को,पक्षी शीत के प्रकोप सेबंद कर चुके होंगे अपनी रागिनी,देव कर चुके होंगे पृथ्वी का परिक्रमण,रवि इतना अलसा चुका होगाकि सोंख ले देह का विटामिन,सड़कों पर चल रहा होगा प्रेतों का नृत्य,लोग दुबके होंगे मोम के खोल मेंसरकंडे की आँच पर...
 पोस्ट लेवल : कविता प्रेम कविता
dilbagvirk
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आख़िर वजह तो है, मय पीने-पिलाने के लिए थोड़ा ज़हर तो चाहिए ही, ग़म भुलाने के लिए। वक़्त ने मिट्टी में मिला दिया देखते-देखतेउम्र लगी थी हमें, जो आशियां बनाने के लिए। ख़ुद को बचाना गर बग़ावत है तो बग़ावत सही वो कर रहा है कोशिशें, मुझे मिटाने के लिए।&nbsp...
अनीता सैनी
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अनझिप पलकों की पतवार पर, अधबनी शून्य में झाँकती,  मन-मस्तिष्क को टटोलती,  हृदय में सुगबुगाती सहचर्य-सी,  कविता कादम्बिनी कद अपना तलाशती है | तिमिरमय सूखे नयनों में, अधखिले स्वप्न साजा, जिजीविषा की सुरभि मे...
Meena Bhardwaj
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आड़ी-टेढ़ी पगडंडी ,और उसके दो छोर ।एक दूजे से मिलने की ,आस लिए चले जा रहे हैं ।उबड़-खाबड़ रास्तों से  ,कभी पास-पास , कभी दूर-दूर ।हमें आपस में बाँधने को ,ना पगडण्डी है , और ना ही कोई कूल-किनारा ।मगर फिर भी ,बन्धन तो बन्धन है ।हमें बाँधता है ,सब की 'आँखों का त...
 पोस्ट लेवल : कविताएँ
रविशंकर श्रीवास्तव
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 पोस्ट लेवल : कविता
Roli Dixit
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मैंने बो दी है अपनी इच्छा'इस समाज में न जीने की'किसी गहरी मिट्टी के नीचेक्योंकि ये समाज सुधरने से रहाऔर मैं ख़ुद को मार नहीं सकती.कैसे जियूँ यहाँ तिल-तिल मरकरहंसने-बोलने पर पाबंदी लगीपढ़ने जाने पर लगीबाहर निकलने पर लगी.जब भी समझाती हूंबाबा अब सब सही हो गयाफ़िर कोई नई...
Rajeev Upadhyay
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कँधे झुक जाते है जब बोझ से इस लम्बे सफ़र केहाँफ जाता हूँ मैं जब चढ़ते हुए तेज चढानेसाँसे रह जाती है जब सीने में एक गुच्छा हो करऔर लगता है दम टूट जायेगा यहीं पर।एक नन्ही सी नज़्म मेरे सामने आ करमुझ से कहती है मेरा हाथ पकड़ करमेरे शायर ला, मेरे कन्धों पे रख देमें तेर...
 पोस्ट लेवल : कविता गुलजार
रविशंकर श्रीवास्तव
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 पोस्ट लेवल : कविता