ब्लॉगसेतु

जेन्नी  शबनम
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हाँ! मैं बुरी हूँ *******मैं बुरी हूँ   कुछ लोगों के लिए बुरी हूँ   वे कहते हैं-   मैं सदियों से मान्य रीति-रिवाजों का पालन नहीं करती   मैं अपनी सोच से दुनिया समझती हूँ   अपनी मनमर्ज़ी करती हूँ, बड़ी ज़िद्दी हू...
Kavita Rawat
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बुरे संग प्रार्थना करने से भले लोगों संग मिलकर डाका डालना भलासुन्दर वस्त्र पहनकर नरक जाने से चिथड़े पहनकर स्वर्ग जाना भलाबेडौल लोहे को हथौड़े से पीट-पीटकर सीधा करना पड़ता हैशेर की मांद में घुसने वाला ही उसका बच्चा पकड़ सकता हैबूढ़ा भेड़िया जोर की चीख-पुकार सुन कभी नहीं ड...
Kavita Rawat
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बह चुके पानी से कभी चक्की नहीं चलाई जा सकती हैलोहे से कई ज्यादा सोने की जंजीरें मजबूत होती हैचांदी के एक तीर से पत्थर में भी छेद हो सकता हैएक मुट्ठी धन दो मुट्ठी सच्चाई पर भारी पड़ता हैनिर्धन मनुष्य की जान-पहचान बहुत मामूली होती हैगरीब की जवानी और पौष की चांदनी बेका...
जेन्नी  शबनम
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पापा ******* ख़ुशियों में रफ़्तार है इक   सारे ग़म चलते रहे   तुम्हारे जाने के बाद भी   यह दुनिया चलती रही और हम चलते रहे   जीवन का बहुत लम्बा सफ़र तय कर चुके   एक उम्र में कई सदियों का सफ़र कर चुके  &nbs...
 पोस्ट लेवल : कविता पुण्यतिथि पापा
Alpana Verma
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 चक्रव्यूह बाह्य रुदन ,भीतर पीड़ा, अव्यवस्था की शमशीर सर आज,वक़्त डराता  है ,गिराता है ,बिखेर देने की धमकियाँ देता है ! सोचती हूँ , हम संभले ही कब थे जो लड़खड़ाने का डर  हो ,बँधे  ही कब थे जो बिखर जाने का डर हो !फिर भी मुस्कुराहटें ओढ़े रहत...
 पोस्ट लेवल : Poem कविताएँ
गायत्री शर्मा
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मैंने नदी से पूछा, नदी- तेरा गाँव कहाँ है? दिल को जहाँ सुकून मिले वो पीपल की छाँव कहाँ है? नदी बोली- मैं जहाँ रूकती हूँ, वहीं मेरा गाँव है। मेरी ठंडक का अहसास ही, पीपल की छाँव है।  मेरे किनारे पर ही बसते है घाट, मंदिर और बस्तियाँ अपार।&nbsp...
 पोस्ट लेवल : nature poem कविता प्रकृति
kumarendra singh sengar
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आएगी फिर वही सुहानी सुबह जब सुनाई देगा सूरज की रौशनी के साथ कलरव पंछियों का, सुनाई देगा शोर स्कूल के लिए दौड़ते-भागते बच्चों का.   आएगी फिर वही सुहानी सुबह जब गलियों में जमी होगी महफ़िल सुबह की सैर करने वालों की, नुक्कड़ की गुमटी पर सज रही होंगी होंठों प...
 पोस्ट लेवल : कविता
जेन्नी  शबनम
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पतझर का मौसम ******* पतझर का यह मौसम है   सूखे पत्तों की भाँति चूर-चूरकर   हमारे अपनों को   एक झटके में वहाँ उड़ाकर ले जा रहा है   जहाँ से कोई नहीं लौटता,   कितना-कितना तड़पें   कितना-कितना रो...
 पोस्ट लेवल : कोरोना मृत्यु कविता
जेन्नी  शबनम
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स्तब्ध हूँ! अवाक् हूँ! मन को यकीन नहीं हो पा रहा कि सुनील मिश्र जी अब हमारे बीच नहीं हैं। कैसे यकीन करूँ कि एक सप्ताह पूर्व जिनसे आगे के कार्यक्रमों पर चर्चा हुई, यूँ अचानक सब छोड़कर चले गए? उनके व्हाट्सएप स्टेटस में लिखा है ''कोई दुःख मनुष्य के साहस से बड़ा नही...
Kavita Rawat
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ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो दुःख और रोग से अछूता रहता है थोड़ी देर का सुख बहुत लम्बे समय का पश्चाताप होता है एक बार कोई अवसर हाथ से निकला तो वापस नहीं आता है दूध बिखरने के बाद रोने-चिल्लाने से कोई फायदा नहीं होता है मनुष्य अपने भाग्य को नहीं उसका भाग्...