ब्लॉगसेतु

Meena Bhardwaj
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एक मुद्दत के बादआईने की रेत हटा खुद के जैसाखुद की नजर सेतुमको देखापहली बार लगावक्त गुजरा कहाँ हैंवहीं थम गया है तुम्हारी पल्लू संभालतीअंगुलियों से लिपटाउजली धूप सी हँसी के साथ मानो कह रहा हो..गुजर जाऊँ मैं वो हस्ती नहींतह दर तह सिमटा युगों सेमैं तो य...
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Meena Bhardwaj
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कुछ बातें ,कई बारबन जाती हैं वजूद की अभिन्न कर्ण के ...कवच-कुण्डल सरीखीअलग होने के नाम परकरती हैं तन और मन दोनों ही छलनीसर्वविदित हैशब्दों की मार ...इनको भी साधना पड़ता हैअश्व के समानतुणीर से निकले बाण हैं शब्द जो लौटते नहीं..जख़्म देते...
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shashi purwar
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1जीवन में कुछ बनना है ,तो लिखना पढना जरुरी है रोज नियम से अभ्यास करो मन लगाकर ही पढना गर्मी की छुट्टी आये ,तब खूब धमाल करना न मेहनत से जी चुराओ ज्ञान लेना भी जरुरी है . झूठ कभी मत बोलना , तुम सच्चाई का थामो हाथ नेक राहों पर चलने से ,बड़ो का मिलता है ,आशीर्वाद ...
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Meena Bhardwaj
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बेमुरव्वत सी इस दुनिया में ,खुद को हम बहलाये कैसे ?जीवन बगिया उलझा मांझा , उलझन को सुलझाये कैसे ?नहीं टूटती मन की चुप्पी ,आस-पास में लोग बहुत है ।फिरते लादे दिल पर बोझा ,किस को सुनने की फुर्सत है ।बीते जिस पर वो दिल जाने ,खुद को वो समझाये कैसे ?जीवन बगिया उलझा...
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Meena Bhardwaj
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स्त्रियाँ चाह रखती आई हैंफूलों से व्यक्तित्व की और   रंग -बिरंगे पंखों के साथ भावनाओं के साँचे में ढलेलौह-स्तम्भ से  घर की...जिसमें देखती हैं वे सदियों से सदियों तक अपनी ही  हुकूमत...अनपढ़ हो या पढ़ी-लिखीबड़ी भोली होती हैं स्त्र...
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Meena Bhardwaj
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स्वार्थ जब हो बड़े अपने मानवता- चर्चा कैसे हो ।फूटते पाँवों के छाले ।दर्द महसूस हो तो हो ।।कहीं पर भोर है उजली । कहीं चहुंओर अंधियारा ।।बना पत्थर हृदय माली । तिनके का कौन सहारा ।।धरती पर आग बरसती है ।मेघों का पानी भी सूखा ।।चले जा रहे हैं जत्थों में ।...
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Meena Bhardwaj
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 इन्तजार..औरप्यार करने का हकउनका भी है तभी तो क्वींसलैंडके नीले समुद्री छोर परपर्यटकों काइन्तज़ार करती हैं डॉल्फिनस्...लॉकडाउन उन्हें लगता है इन्सान की नाराजगी दबाये मुँह में ला रही हैंसीप-शंख के साथलकड़ी के  टुकड़े ... मानो .. रूठे...
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Meena Bhardwaj
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 विकास रथ की धुरी सहितअर्थ व्यवस्था अट्टालिका केनींव प्रस्तर...तुम कमतर कैसे हो गएदर दर की झेलते अवहेलनाअपने श्रम से खड़े करतेगगनचुंबी भवन…अपने ही घर में प्रवासी कैसे हो गएमूल्य समझो कभी तो निज मान काबनते अंग सदा भीड़ तंत्र काजनता जनार्दन हो तुम …..विपद- बेला मे...
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Meena Bhardwaj
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कस के मुट्ठी में बंद हैं वेमाँ से जिद्द कर लिएसिक्के की तरह…स्कूल से आते समयखानी है टॉफी संतरे वाली..जीरे वाली…उस वक्त...वो सिक्का गुम गयानिकाल लिया किसी नेपेन्सिल बॉक्स से...या फिरगिर गया कहींमेरी ही लापरवाही से… ख्वाब बस ख्वाब ही रहामगर याद रही नसीहत......
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Meena Bhardwaj
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गुलमोहर...लाल-पीले फूलों की झब्बेदार टोकरी जैसे भरी धूप में किसी ने उलट के रख दी तने के सिर पर…उस पेड़ को देख भान होता  हैजैसे.. कुदरत ने छतरी तान रखी हो...मन्त्रमुग्ध सा करता हैअपनी मधुरिमा सेगुलमोहर...बचपन में खेलते-पढ़तेबंट जाता था ध्यानजब...
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