ब्लॉगसेतु

Yashoda Agrawal
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आज फिरइन सीढियों परनर्म आहट खुशबुओं कीदबे पाँवों धूप लौटीऔर कमरे में घुसीउँगलियाँ पकड़े हवा कीचढ़ी छज्जे पर ख़ुशीबात फिरहोने लगी हैफुसफुसाहट खुशबुओं कीएक नीली छाँवदिन भरखिड़कियाँ छूने लगीआँख-मींचे देखती रितुढाई आखर की ठगीतितलियाँदालान भर मेंहै बुलाहट खुशबुओं की1940...
Yashoda Agrawal
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एक समय वो भी रहाजब हर चीज़ कस कर पकड़ने की आदत थीचाहे अनुभूतियाँ होंपल होंरिश्ते होंया कोई मर्तबान हीमुट्ठियाँ भिंची रहतीजब स्थितियाँ बदलतींऔर चीज़े हाथ से फिसलतीतो नाखूनों में रह जाती किरचनेंस्मृतियों कीलांछनों कीछटपटाहटों कीकांच कीअजीब सा दंश थाकि मैं दिन भर नाखू...
Yashoda Agrawal
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पूरी रात जागता रहासपने सजाता,तुम आती थीं, जाती थींफिर आतीं फिर जातीं ,परन्तुयादें करवट लिए सो रही थींसुबह,यादों ने ही मुझे झझकोराऔर जगाया,जब मै जागायादें दूर खड़ी होघूर-घूर कर मुझे देखतीऔर मुस्कुरा रहीं थींमैंने कहाचलो हटो ,आज नई सुबह हैमै नई यादों के साथ रहूँगावे...
Yashoda Agrawal
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बस एक लम्हे का झगड़ा थादर-ओ-दीवार पे ऐसे छनाके से गिरी आवाज़जैसे काँच गिरता हैहर एक शय में गईउड़ती हुई, चलती हुई, किरचेंनज़र में, बात में, लहजे में,सोच और साँस के अन्दरलहू होना था इक रिश्ते कासो वो हो गया उस दिनउसी आवाज़ के टुकड़े उठा के फर्श से उस शबकिसी ने काट ली...
 पोस्ट लेवल : कविताकोश गुलज़ार
Yashoda Agrawal
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खाली कागज़ पे क्या तलाश करते हो?एक ख़ामोश-सा जवाब तो है।डाक से आया है तो कुछ कहा होगा"कोई वादा नहीं... लेकिनदेखें कल वक्त क्या तहरीर करता है!"या कहा हो कि... "खाली हो चुकी हूँ मैंअब तुम्हें देने को बचा क्या है?"सामने रख के देखते हो जबसर पे लहराता शाख का सायाहाथ हिल...
 पोस्ट लेवल : कविताकोश गुलज़ार
Yashoda Agrawal
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प्लास्टिक के पेड़नाइलॉन के फूलरबर की चिड़ियाँटेप पर भूले बिसरेलोकगीतों कीउदास लड़ियाँ.....एक पेड़ जब सूखतासब से पहले सूखतेउसके सब से कोमल हिस्से-उसके फूलउसकी पत्तियाँ ।एक भाषा जब सूखतीशब्द खोने लगते अपना कवित्वभावों की ताज़गीविचारों की सत्यता –बढ़ने लगते लोगों के ब...
Yashoda Agrawal
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गुज़रती रही सदियाँबीतते रहे पलआएकितने ही दलदलपर झेल सब कुछअब तक अड़ी हूँ मैं !अटल खड़ी हूँ मैं !अट्टालिकाएँ करें अट्टहासगर्वित उनका हर उच्छ्वासअनजान इस बात से किनींव बन पड़ी हूँ मैं !अटल खड़ी हूँ मैं !देख नहीं पाते तुमदामन छुड़ा हो जाते हो गुमपर मैं कैसे बिसार दूँइ...
Yashoda Agrawal
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कहाँ गया तू मेरा लाल।आह! काढ़ ले गया कलेजा आकर के क्यों काल।पुलकित उर में रहा बसेरा।था ललकित लोचन में देरा।खिले फूल सा मुखड़ा तेरा।प्यारे था जीवन-धान मेरा।रोम रोम में प्रेम प्रवाहित होता था सब काल।1।तू था सब घर का उँजियाला।मीठे बचन बोलने वाला।हित-कुसुमित-तरु सुन्दर...
Yashoda Agrawal
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जिन मुश्किलों में मुस्कुराना हो मना,उन मुश्किलों में मुस्कुराना धर्म है।जिस वक़्त जीना गैर मुमकिन सा लगे,उस वक़्त जीना फर्ज है इंसान का,लाजिम लहर के साथ है तब खेलना,जब हो समुन्द्र पे नशा तूफ़ान काजिस वायु का दीपक बुझना ध्येय होउस वायु में दीपक जलाना धर्म है।हो नहीं...
Yashoda Agrawal
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जो नहीं हो सके पूर्ण–काममैं उनको करता हूँ प्रणाम ।कुछ कंठित औ' कुछ लक्ष्य–भ्रष्टजिनके अभिमंत्रित तीर हुए;रण की समाप्ति के पहले हीजो वीर रिक्त तूणीर हुए !उनको प्रणाम !जो छोटी–सी नैया लेकरउतरे करने को उदधि–पार;मन की मन में ही रही¸ स्वयंहो गए उसी में निराकार...