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sanjiv verma salil
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आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ - मानवीय संवेदनाओं के कविआचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी का नाम अंतर्जाल पर हिंदी साहित्य जगत में विशेष रूप से सनातन एवं नवीन छंदों पर किये गए उनके कार्य को लेकर अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है, गूगल पर उनका नाम लिखते ही सैकड़ों के संख्या मे...
Meena Bhardwaj
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कुछ बातें ,कई बारबन जाती हैं वजूद की अभिन्न कर्ण के ...कवच-कुण्डल सरीखीअलग होने के नाम परकरती हैं तन और मन दोनों ही छलनीसर्वविदित हैशब्दों की मार ...इनको भी साधना पड़ता हैअश्व के समानतुणीर से निकले बाण हैं शब्द जो लौटते नहीं..जख़्म देते...
 पोस्ट लेवल : कविताएँ
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तितली आई! तितली आई!!रंग-बिरंगी, तितली आई।।कितने सुन्दर पंख तुम्हारे।आँखों को लगते हैं प्यारे।।फूलों पर खुश हो मँडलाती।अपनी धुन में हो इठलाती।।जब आती बरसात सुहानी।पुरवा चलती है मस्तानी।।तब तुम अपनी चाल दिखाती।लहरा कर उड़ती बलखाती।।पर जल्दी ही थक जाती हो।दीवारों...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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आम की फली हुईं अमराइयों मेंकोयल का कुहू-कुहू स्वर आज भी उतना ही सुरीला सुनाई दे रहा हैमयूर भी अपने नृत्य की इंद्रधनुषी आभा से मन को मंत्रमुग्ध करता दिखाई दे रहा हैतितली-भंवरे मधुवन में अपने-अपने मंतव्य ढूँढ़ रहे...
शालिनी  रस्तौगी
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तुमने बोला... प्रेम लिखोऔर मैंने बड़े जतन से दिल की धड़कन लिख दी....आँखों की उलझन,रूह की तड़पन,प्रीत में डूबे भाव लिखे ...जो कहे नहीं थे अब तक वो भीगे-भीगे जज़्बात लिखे। पलकों पर ठहरा इंतेज़ार लिखा,उम्र भर का क़रार लिखा,आँखों के झिलमिल ख़्वाब लिखे, लब पर ठहरे अल्फ़ा...
शालिनी  रस्तौगी
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मौत से पहले क्या मरना .....!माना घनघोर अँधेरा है, सूरज पर तम का पहरा है, निराशा घन घनघोर बड़ेअवसाद ने डाला डेरा है......पर कब तक आशा पुंज छिपेगा?कब तक तम दम-ख़म भरेगा?तम के गहरे गह्वर को चीरकल फिर से सूरज चमकेगा,अँधेरे से क्या डरना!!जब तक जीवन है जीना है,मौत से पहले...
 पोस्ट लेवल : #सुशांत कविता
Bharat Tiwari
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और फिर वह हॅंसी फिर उभरी आश्वस्त करती / थोड़ा ताजा थोड़ा नम / ‘‘ और ठीक हो न / कुछ लिखते भी हो / मैंने पढ़ा था शायद.........’’रघुवंश मणि की कविताओं को पढ़ते हुए जिस अद्भुत ख़ुशी का आगमन होना शुरू होता है, उसके लिए मैं सोचता हूँ कि उन संवेदनशीलों, कविता प्रेमियों और साहि...
Roli Dixit
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तुम्हारा हाथ अपने हाथों में लेकरसदियों तक बैठना चाहती हूँ तुम्हारे पासऔर तुमसे पूछना चाहती हूँ वो सब कुछजो मैं तुम्हें पढ़ते हुए महसूस कर पाती हूँ…कैसे उतरती हैं मुंडेरें छत सेशाम की ढलती धूप में,कैसे कागज रोता है शब्दों से गले लगने को,कैसे प्रेमी की आँखों में रात ह...
अरुण कुमार निगम
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ऋता शेखर 'मधु'
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खुशबुओं की पालकी से शुभ्रता को पा रही है।पुष्प का उपहार पाकर तू बहुत इतरा रही है।ऐ हवा ये तो बता तू अब किधर को जा रही है।।चाहते जिसको सभी वह रूप तेरा है बसंती,झूमती हर इक कली का है बना अनुबंध तुझसे।डालियाँ घूमीं उधर जाने लगी तू जिस दिशा में,मंद शीतल जब हुई तू है बन...
 पोस्ट लेवल : कविता गीत छंद