ब्लॉगसेतु

रवीन्द्र  सिंह  यादव
241
इंसानी रंगभेद इंसानी बुद्धि का नाजाएज़ फ़ितूर है बुद्धि का चरित्र विभाजन में भी विभाजन करना है इतना विभाजन कि वस्त्र का रेशा-रेशा पृथक-पृथक हो जाय ताकि इन्हें मन-मुताबिक़ तोड़ने-मोड़ने मेंइच्छित ध्रुवीकरण होने में  आसानी...
YASHVARDHAN SRIVASTAV
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दिल को सुकून देतीवो मधुर संगीत हैआंखो में चमक भर देतावो तारा संगीत है।मन को खुश कर देतीवो धूप संगीत हैकमजोरी को हिम्मत देतावो साहरा संगीत है।जिंदगी को उम्मीद देतीवो भरपूर संगीत हैहौसलों में जुनून भर देतावो उजियारा संगीत है।चेहरे पर मुस्कान ला देतीवो सुकून सा संगीत...
Roshan Jaswal
50
आसान  नहीं   मेरा   सफर  देख  रही  हूँकुछ छाँव मिले अब वो शजर देख रही हूँहाँ बादे  सबा  को  में जिधर देख रही हूंखुशबू लिए महकी सी सहर देख रही हूँमुश्किल है बहुत हिज्र में दिल को मिले आरामउठती  है जो ...
 पोस्ट लेवल : गज़ल कवितायें
Meena Bhardwaj
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स्वार्थ जब हो बड़े अपने मानवता- चर्चा कैसे हो ।फूटते पाँवों के छाले ।दर्द महसूस हो तो हो ।।कहीं पर भोर है उजली । कहीं चहुंओर अंधियारा ।।बना पत्थर हृदय माली । तिनके का कौन सहारा ।।धरती पर आग बरसती है ।मेघों का पानी भी सूखा ।।चले जा रहे हैं जत्थों में ।...
 पोस्ट लेवल : कविताएँ
इंदु सिंह
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सन्नाटा पसरा पड़ा हैरात उतरने को हैशहर के सारे लैम्पपोस्ट जगमग हैंबहुत कुछ घट गया बीती रात मेंबहुत कुछ घट रहा भरी दोपहरआँखें सबकी खुली हैंफिर, कब हुआ ये सब ?गढ़ दी गई कोई कहानी औरसब चल पड़े हैं …!
 पोस्ट लेवल : कविता
ऋता शेखर 'मधु'
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ताटंक छंद में दिनकर पूर्व दिशा से लाल चुनरिया, ओढ़ धरा पर आते हैं | ज्योति-पुँज हाथों में लेकर, शनै-शनै बिखराते हैं || सफर हमारा चले निरंतर, घूम-घूम बतलाते हैं | अग्नि-कलश माथे पर धरकर, हम दिनकर कहलाते हैं || स्वर्ण रश्मियों की आहट से, खेतों ने अँगड़ाई ली | हाथ उठ...
देवेन्द्र पाण्डेय
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लोहे के घर की खिड़की सेबगुलों कोभैंस की पीठ पर बैठकथा बाँचते देखा।धूप में धरती कोगोल-गोल नाचते देखा।घर में लोग बातें कर रहे थे...किसने कितना खाया?हमने तो बस फसल कटे खेत मेंभैस, बकरियों कोआम आदमी के साथ भटकते देखा।खिड़की से बाहर चिड़ियों कोदाने-दाने के लिए,चोंच लड़ाते द...
 पोस्ट लेवल : लोहे का घर कविता
ऋता शेखर 'मधु'
119
चित्र गूगल से साभाररिक्शावाला.....राह को स्वेद से सींचता हुआ रिक्शे को दम से खींचता हुआ बाहों पर उभरी नसें लिये वह कृशकाय, वृद्धावस्था में रिक्शे को लिए जा रहा है आसमान में धूप चढ़ी है सवारी को तिरपाल से बचाता अपना सिर गमछ से बचा रहा हाँ, वह रिक्शा चला रहा सवारी को...
 पोस्ट लेवल : कविता
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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सीमा पर चीन आक्रामक रुख़ के साथ भारत को उकसा रहा है शांति की आशाओं को धूमिल कर रहा रेलगाड़ियाँ इरादतन राह भटककर मज़दूरों की जबरन मौत का कारण बन रहीं हैं तपती सड़कों पर भूखे-प्यासेथके-हारे पैदल चलते साधनहीन बच्चे-बूढ़े-जवान स्त्री-...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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सूखे-अकड़ेपत्ते खड़केतो ज्ञात हुआ वायु जाग रही हैग़रीब की बिटिया ने जो दीपक जलाया थासाँझ ढले  बस थोड़े-से तेल में बाती भिगोकरजलकर बुझ गया है भानु के चले जाने के बाद भी रौशनी की याद ताज़ा करने का चलन अब विश्वास में ढल गया है&n...