ब्लॉगसेतु

usha kiran
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सुनो !कब , क्या कहा माँ नेभूल जाओ अबवो सारी नसीहतेंवो हिदायतेंलिखो न अबखुद की आचार संहिताअपनी कलम सेअपनी स्याही सेऔर फिरसौंप देना बेटी कोवो लिखेगी उसके आगेअपने हिसाब सेमनचाहे रंगों सेआखिरक्यों ठिठके रहें हमचौखटों में सिमटेसोचते रहें कि...क्या कहा था माँ नेदादी या न...
 पोस्ट लेवल : कविता
देवेन्द्र पाण्डेय
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रोटी पर बैठकरउड़े थेकोरोना खा गया रोटीपैदल हो गएसभी बच्चेतलाश थीट्रेन की, बस कीकुचले गएपटरी पर, सड़क परहमधृतराष्ट्र की तरहअंधे नहीं थेदेखते रहे दूरदर्शनदेखते-देखतेमर गएकई बच्चे!शहर सेपहुँचे हैं घरबीमार हैं, लाचार हैंजागते/सोतेदेखते हैं स्वप्न...रोटी का सहारा हो तोउड़...
 पोस्ट लेवल : सर्वहारा कविता मजदूर
Meena Bhardwaj
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 इन्तजार..औरप्यार करने का हकउनका भी है तभी तो क्वींसलैंडके नीले समुद्री छोर परपर्यटकों काइन्तज़ार करती हैं डॉल्फिनस्...लॉकडाउन उन्हें लगता है इन्सान की नाराजगी दबाये मुँह में ला रही हैंसीप-शंख के साथलकड़ी के  टुकड़े ... मानो .. रूठे...
 पोस्ट लेवल : कविताएँ
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जो शिव-शंकर को भाती है बेल वही तो कहलाती है  तापमान जब बढ़ता जाता पारा ऊपर चढ़ता जाता अनल भास्कर जब बरसाता लू से तन-मन जलता जाता  तब पेड़ों पर पकती बेल गर्मी को कर देती फेल इस फल की है महिमा न्यारी गूदा इस...
kumarendra singh sengar
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जनता कर्फ्यू के दिन से यदि जोड़ लिया जाये तो लॉकडाउन जैसी स्थिति के दो महीने हो चुके हैं. वैसे लॉकडाउन वास्तविक स्वरूप में 25 मार्च से आया था. हमने उसी दिन दे स्केचिंग करना फिर से शुरू कर दिया था. किसी समय स्केचिंग खूब की. स्कूल के समय में, कॉलेज में इसका भरपूर आनंद...
अभिलाषा चौहान
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 पोस्ट लेवल : कविता
kumarendra singh sengar
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फूल खिलने लगे गुलशन के मगर,फूल गुमसुम हैं कितने घर के मगर.कौन आया जहाँ में ये हलचल हुई.आज डरने लगे लोग खुद से मगर.(पूरी कविता पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें).#हिन्दी_ब्लॉगिंग 
kumarendra singh sengar
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फूल खिलने लगे गुलशन के मगर,फूल गुमसुम हैं कितने घर के मगर.कौन आया जहाँ में ये हलचल हुई.आज डरने लगे लोग खुद से मगर. दौड़ती-भागती ज़िन्दगी है थमी,न आये समझ क्या गलत क्या सही.सबकी आँखों में कितने सवालात हैं,उनके उत्तर नहीं हैं मिलते मगर.  लोग हैरान हैं और परेशान है...
 पोस्ट लेवल : कविता गीत
Meena Bhardwaj
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 विकास रथ की धुरी सहितअर्थ व्यवस्था अट्टालिका केनींव प्रस्तर...तुम कमतर कैसे हो गएदर दर की झेलते अवहेलनाअपने श्रम से खड़े करतेगगनचुंबी भवन…अपने ही घर में प्रवासी कैसे हो गएमूल्य समझो कभी तो निज मान काबनते अंग सदा भीड़ तंत्र काजनता जनार्दन हो तुम …..विपद- बेला मे...
 पोस्ट लेवल : कविताएँ
देवेन्द्र पाण्डेय
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तुम नदी की धार के संग हो रहे थेफेंककर पतवार भी तुम सो रहे थे।बह रही उल्टी नदी, अब क्या करोगे?क्या नदी के धार में   तुम फिर बहोगे?चढ़ नहीं सकती पहाड़ों पर नदीहै   बहुत  लाचार देखो यह सदी।डूब जाएंगे सभी घर, खेत, आंगनया तड़प, दम तोड़ देगी खुद अभाग...
 पोस्ट लेवल : कोरोना कविता मजदूर