ब्लॉगसेतु

Anand Dwivedi
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अंग्रेजी का एक बड़ा सकारात्मक सा लगने वाला एक शब्द है  कमिटमेंट , मुझे हमेशा विजय/सफलता की कामना और कमिटमेंट अति भौतिकवादी और अहम् को पोषित करने वाले लगते हैं ... कभी हार के देखिये ...मगर अहम् से भरी हुई हार नहीं ...वो तो जैसे ही अहम् को चोट लगेगी आपको तोड़ देगी...
 पोस्ट लेवल : कही अनकही
डॉ.अमित कुमार नेमा
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जी हाँ , आज के शीर्षक से आप को कुछ-कुछ आभास तो हो ही गया होगा कि आज चर्चा का विषय है एक किताब और एक अंतर्जाल स्थल , अपनी बात शुरू करते हैं इश्क़ की किताब से फिर आप और हम चलेंगे ब्लॉग के सेतु पर : 'इश्क़ तुम्हें हो जाएगा' हाथ में आई कोई किताब तब तक दिल में न...
Anand Dwivedi
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ये विदाई की तैयारियों वाली एक औसत शाम थी, जिसमें बातें कम थीं, ख़ामोशी ज्यादा; दर्द उससे  भी ज्यादादो सच्चे दिल, मगर अलहदा रास्तों के मुसाफ़िर ....एक ने नज़रें उठाकर कहाअपना ख़याल रखनादूसरे ने नज़रें झुकाकर पूछा … "मगर किसके लिए"अपने लिए …औ...
 पोस्ट लेवल : कही अनकही
डॉ.अमित कुमार नेमा
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कड़ी धूप में अपने घर से निकलनावो चिड़िया वो बुलबुल वो तितली पकड़ना       अब तो बचपन ही खो गया है , हुमकते कंधे झुक से गये हैं !! “लद्दू घोड़े के जैसे दौड़ना है और सबसे आगे जाना है” हर वक्त बच्चों के कान में यही मन्त्र फूँका जाता है ।   &nbs...
डॉ.अमित कुमार नेमा
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नित नूतन नव जीवन है , हाथ बढा के छू लो ,बिखरा है आनंद यहाँ , कभी तो खुद को भूलो । “विनायक” का जन्म एक अद्वितीय घटना है , सृष्टि में यह कोई पहला जन्म नहीं लेकिन हर जन्म के साथ ही कुदरत नाम की “ बड़ी माँ “ का एक और नया जन्म जरूर है , और वो जो बड़ी माँ सबका ध्यान र...
डॉ.अमित कुमार नेमा
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         पहले-पहल यही कह दूँ कि यह कोई समीक्षा नहीं है, क्योंकि इन कृतियों को लेकर मैं समीक्षात्मक हो ही नहीं सकता और एक बात यह भी है कि मेरी इतनी क्षमता नहीं कि इन पर कोई समालोचना प्रस्तुत कर सकूं । समझ लीजिये कि यह आंतरिक प्रसन्नता है जि...
अविनाश वाचस्पति
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ऋता शेखर 'मधु'
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कहीं कुछ शाश्वत नहीं कुछ भी तो नहीं न अँधेरा न उजाला न गीष्म न शरद न अमृत न विष का प्यालाशाश्वत हैं सूरज और चंदामगर गति शाश्वत नहीं दिन होते हर रोज़ मगर उजियार शाश्वत नहींकभी मेघ घिरे कभी धुंध उगे कभी ग्रहण की छाया हर दि...
अविनाश वाचस्पति
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Anand Dwivedi
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हमेशा सुना था कि कोई इंसान पूर्ण नहीं होता ... सब में कुछ न कुछ कमियां होती ही हैं .... ऐसा क्यों करता है ऊपर वाला ? क्यों हमारे कुछ टुकड़े.... हमारे अपने टुकड़े इधर उधर फेंक देता है ... जिसे हम जीवन भर ढूंढते रहते हैं ... सब कुछ होते हुए भी कुछ न कुछ सबका होता है...
 पोस्ट लेवल : कही अनकही