ब्लॉगसेतु

anup sethi
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दिव्‍य हिमाचल से बातचीतहिमाचल प्रदेश के एक दैनिक दिव्‍य हिमाचल ने लिखने पढ़़ने वालों के साथ बातचीत की एक श्रृंखला शुरू की है। इसमें मेरी बातचीत 18 अगस्‍त 2018 को प्रकाशित हुई थी जो यहां दी जा रही है। दिव्‍य हिमाचल : अपने भीतर के विद्रोह का संवाद अगर कविता है,...
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कल भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार शुभम् श्री की 'पाेएट्री मैनेजमेंट' कविता  को देने की घोषण्‍ाा हुई और जैसा अक्‍सर होता है, सोशल मीडिया पर अच्‍छे-बुरे, सही-गलत की बहस छिड़ गई। पहली प्रतिक्रिया में मुझे लगा कि कविता की गिरी हुई सामाजिक स्‍िथति को कविता के केंद...
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   चित्रकृति: संजय राउतसमकालीन कविता पर जय प्रकाश का यह लेख कविता की अंतर्धारा को समझने में मदद करता है, वागर्थ के अप्रैल अंक से साभारबीसवीं सदी के अन्तिम दशकों में जो अभूतपूर्व साभ्यतिक परिवर्तन हुए, उनके चलते मानवीय संवेदना के क्षरण की प्रक्रिया मे...
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    वरिष्‍ठ कवि चंद्रकांत देवताले जी से मिलने का पहला मौका आकशवाणी इंदौर के एक कार्यक्रम के सिलसिले में मिला जब हम लोग दूरदर्शन के गेस्‍ट हाउस में एक रात ठहरे. उनसे मिल कर बहुत अच्‍छा लगा. वे बहुत सहज हैं और दूसरे व्‍यक्ति को भी पूरी तरह से सहज बना देते...
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संकट हिंदी कविता नहीं असल में हिंदी आलोचना का हैमुंबई ये प्रकाशित पत्रि‍का चिंतनदिशा में पिछले कुछ अंकों से चल रही बहस को आप यहां पढ़ते आए हैं. पत्रि‍का के  ताजा छपे अंक में इस बहस की अगली कड़ी के रूप में युवा कवि आलोचक अशोक कुमार पांडेय का लेख छपा है.  य...
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धीरोदात्त नायक की प्रतीक्षा करती और साथ ही उत्तेजक उत्तर-आधुनिकतावादी नारीवादी विमर्श करती पद्मिनी नायिका कथादेश में पवन करण और अनामिका की कविताओं पर जारी बहस में कात्‍यायनी का लेख. इस बहस में आप पहले प्रभु जोशी का लेख पढ़ चुके हैं.   रजा, &n...
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छायांकन - हरबीर यह लेख कुछ वर्ष पहले शिखर संस्‍था द्वारा हिमाचल की युवा रचनाशीलता पर आयोजित संगोष्‍ठी‍ में पढ़ा गया था. हाल में यह स्‍वाधीनता के शारदीय विशेषांक में छपा है. इस बीच आत्‍मारंजन का काव्‍यसंग्रह पगडंडियां गवाह हें भी आ गया है और अजेय के संग्रह की घोषणा...
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जैसा कि आप जानते हैं, मुंबई से प्रकाशित पत्रि‍का चिंतनदिशा में विजय बहादुर सिंह और विजय कुमार की चिट्ठियों के जरिए समकालीन कविता पर बहस शुरू हुई थी. अगले अंकों में इन चिट्ठियों पर विजेंद्र और जीवन सिंह; राधेश्‍याम उपाध्‍याय, महेश पुनेठा, सुलतान अहमद...
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इधर हिंदी साहित्‍य जगत में बात-बात में बहसें क्‍या उठ खड़ी हो जा रही हैं, मानो पानी को उबाल कर गाढ़ा करने का खेल चल रहा हो. पत्रि‍काओं के चूल्‍हे पर जहां पतीलियों में पानी चढ़ाया जाता है, वहां इंटरनेट का पंखा आग को हवा देने की ड्यूटी संभाल लेता है. सब जानते हैं पान...