ब्लॉगसेतु

Basudeo Agarwal
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महिमा कुर्सी की बड़ी, इससे बचा न कोय।राजा चाहे रंक हो, कोउ न चाहे खोय।कोउ न चाहे खोय, वृद्ध या फिर हो बालक।समझे इस पर बैठ, सभी का खुद को पालक।कहे 'बासु' कविराय, बड़ी इसकी है गरिमा।उन्नति की सौपान, करे मण्डित ये महिमा।।बासुदेव अग्रवाल 'नमन'तिनसुकिया22-12-2018
sanjiv verma salil
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इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ खुदा! कौन-कौन इस चित्र पर अपनी कलम चलाएगा? गद्य या पद्य की किसिस भी विधा में लिखें-*चित्र पर रचना:छंद:  कुंडलिया*विधान: एक दोहा + एक रोलाअ. २ x १३-११, ४ x ११-१३ = ६ पंक्तियाँआ. दोहा का आरंभिक शब्द या शब्द समूह रोला का अंतिम शब्द...
 पोस्ट लेवल : कुंडलिया kundaliya
Basudeo Agarwal
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सारी पहने लहरिया, घर से निकली नार।रीत रिवाजों में फँसी, लम्बा घूँघट डार।लम्बा घूँघट डार, फोन यह कर में धारे।शामत उसकी आय, हाथ इज्जत पर डारे।अबला इसे न जान, लाज की खुद रखवारी।कर देती झट दूर, अकड़ चप्पल से सारी।।बासुदेव अग्रवाल 'नमन'तिनसुकिया19-5-17
Basudeo Agarwal
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मोबॉयल से मिट गये, बड़ों बड़ों के खेल।नौकर, सेठ, मुनीमजी, इसके आगे फेल।इसके आगे फेल, काम झट से निपटाता।मुख को लखते लोग, मार बाजी ये जाता।निकट समस्या देख, करो नम्बर को डॉयल।सौ झंझट इक साथ, दूर करता मोबॉयल।।मोबॉयल में गुण कई, सदा राखिए संग।नूतन मॉडल हाथ में, देख लोग हो...
Basudeo Agarwal
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कुंडलियाँ दोहा और रोला के संयोग से बना छंद है। इस छंद के ६ चरण होते हैं तथा प्रत्येक चरण में २४ मात्राएँ होती है। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि कुंडलियाँ के पहले दो चरण दोहा के तथा शेष चार चरण रोला से बने होते हैं।दोहा के प्रथम एवं तृतीय पद में १३-१३ मात्राएँ तथा दूसरे...
sanjiv verma salil
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एक कुंडलिया दिल्ली का यशगान ही, है इनका अस्तित्वदिल्ली-निंदा ही हुआ, उनका सकल कृतित्वउनका सकल कृतित्व, उडी जनगण की खिल्ली पीड़ा सह-सह हुई तबीयत जिसकी ढिल्ली संसद-दंगल देख, दंग है लल्ला-लल्लीतोड़ रहे दम गाँव, सज रही जमकर दिल्ली***२-५-२०१७http://divyanar...
 पोस्ट लेवल : कुंडलिया kundaliya
ऋता शेखर 'मधु'
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जागो वोटर जागोअपने मत का दान कर, चुनना है सरकार।इसमें कहीं न चूक हो, याद रहे हर बार।।याद रहे हर बार, सही सांसद लाना है।जो करता हो काम, उसे ही जितवाना है।सर्वोपरि है देश, जहाँ पलते हैं सपने।'मधु' उन्नत रख सोच, चुनो तुम नेता अपने।।१जिम्मेदारी आपकी, चुनने की सरकार।सजग...
sanjiv verma salil
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कुछ त्रिपदियाँ*नोटा मन भाया है,क्यों कमल चुनें बोलो?अब नाथ सुहाया है।*तुम मंदिर का पत्ताहो बार-बार चलतेप्रभु को भी तुम छलते।*छप्पन इंची छातीबिन आमंत्रण जाकरबेइज्जत हो आती।*राफेल खरीदोगे,बिन कीमत बतलायेकरनी भी भोगोगे।*पंद्रह लखिया किस्साभूले हो कह जुमलाअब तो न...
ऋता शेखर 'मधु'
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कलकल नदिया है बही, छमछम चली बयार |गिरिराज हैं अटल खड़े, लिए गगन विस्तार ||लिए गगन विस्तार, हरी वसुधा मुस्काई ,दूर्वा पर की ओस, धूप देख कुम्हलाई ||तितली मधु को देख, मटक जाती है हरपल ,छमछम चली बयार, बही है नदिया कलकल ||गरिमा बढ़ती कार्य से, होता है गुणगान |जग में सूर...
ऋता शेखर 'मधु'
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जीवन यात्रा अनवरत, चली सांस के साथ |मध्यम या फिर तीव्र गति, स्वप्न उठाती माथ ||स्वप्न उठाती माथ, कभी रोती या हँसती |करती जाती यत्न, राह से कभी न हटती|पढ़ कर हर पग पाठ,'ऋता'' बनती है छात्रा|चुक जाएगी सा़ंस, रुकेगी जीवन यात्रा||जिनके हिय में हरि बसे, वे हैं साधु समान...