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अरुण कुमार निगम
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छंद कुण्डलिया : चिट्ठी(1)बीते दिन वो सुनहरे  ,  नैन  ताकते द्वारकब आएगा डाकिया  , लेकर चिट्ठी- तारलेकर चिट्ठी -तार , डाकखाने के चक्करपत्र कभी नमकीन,कभी ले आते शक्करसीने से लिपटाय ,  खतों को लेकर जीतेनैन ताकते द्वार   ,  सुनहरे वो...
संतोष त्रिवेदी
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कुण्डलियाँफागुन गच्चा दे रहा,रंग रहे भरमाय। आँगन में तुलसी झरे,आम रहे बौराय।। आम रहे बौराय,नदी-नाले सब उमड़े। सुखिया रहा सुखाय,रंग चेहरे का बिगड़े।। सजनी खम्भा-ओट , निहारे फिर-फिर पाहुन। अपना होकर काट रहा ये बैरी फागुन।।(१)होली में देकर दगा,गई हसीना भाग ,पिचकारी...
अरुण कुमार निगम
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होता  अति का   अंत है , कह गये सारे संतएक  सरीखे  रह गये  ,   पतझर और बसंतपतझर और   बसंत , सभी मौसम हैं घायलदूषित जल में मौन , हुई  सरिता की पायललुप्त  हो   रहे  जीव  ,  बया   गौरैय्या&nbsp...
अरुण कुमार निगम
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(चित्र ओबीओ से साभार) अनगढ़ मिट्टी पा रही , शनै: - शनै: आकारदायीं  -  बायीं  तर्जनी  ,  देती  उसे  निखारदेती  उसे  निखार , मध्यमा संग कनिष्काअनामिका  अंगुष्ठ , नाम छोड़ूँ मैं किसकामिलकर  रहे सँवार , रहे ना कोई...
 पोस्ट लेवल : कुण्डलिया छंद
अरुण कुमार निगम
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भेजे  में  घुसता  नहीं ,  राजनीति  का  खेलहमने सीखा बंधुवर  ,  दिल से दिल का मेलदिल से दिल का मेल ,जात औ’ पात न जानेचेहरे का  क्या  काम  ,  धड़कनों से पहचानेप्रेम - मार्ग चल ‘अरुण’ ,नयन में नेह सहेजे हृदय...
 पोस्ट लेवल : कुण्डलिया छंद :
अरुण कुमार निगम
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चोंच  नुकीली तीक्ष्ण  हैं ,पंजों के नाखूनजो  भी  आये  सामने , कर  दे  खूनाखूनकर दे खूनाखून , बाज  है  बड़ा  शिकारीगौरैया खरगोश  , कभी बुलबुल की बारीचोंच सभी की मौन,व्यवस्था ढीली-ढीलीचोंच लड़ाये कौन, बाज की चोंच...
 पोस्ट लेवल : कुण्डलिया छंद :
अरुण कुमार निगम
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(1)मतलब का मतलब कभी , मत लब से तू बोलतलब छुपी इसमें बुरी , बल तम  इसके  खोलबल तम इसके खोल , बलम जी  इसमें है बमइसके तल में  स्वार्थ  , बसा  करता है  हरदमरिश्ते - नाते ‘अरुण’ ,  तोड़  देता है जब- तबमत लब से तू बोल, कभी मत...
 पोस्ट लेवल : तीन कुण्डलिया छंद –
अरुण कुमार निगम
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पीले चाँवल द्वार.....पंगत की रंगत गई  , गया प्रेम सत्कारनयन तरसते देखने ,  पीले चाँवल द्वारपीले चाँवल द्वार  , हुआ कैसा परिवर्तनमोबाइल से कभी,मेल से मिले निमंत्रणहुये सभी रोबोट, मशीनों की कर संगतगया प्रेम सत्कार , खो गई पत्तल पंगत ||अरुण कुमार निगमआ...
अरुण कुमार निगम
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पीपल अब सठिया गया,रहा रात भर खाँसप्रेम पात सब झर गये , चढ़-चढ़ जावै साँस चढ़- चढ़ जावै साँस , कहाँ वह हरियाली हैआँख  मोतियाबिंद , उसी की  अब लाली हैछाँह गहे अब कौन , नहीं रहि छाया शीतलरहा रात भर खाँस, अब सठिया गया पीपल ||   अरुण कुमार निगमआदित्य नग...
अरुण कुमार निगम
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कुण्डलिया : अक्स दिखाता आइना , देता मन को ठेसभ्रम के मायाजाल में, मिलते कष्ट कलेसमिलते कष्ट कलेस,दुखों पर सुख के परदेसुंदरता  का  मोह  ,  नयन को अंधा कर देभटकाता  है  राह  , हमेशा रक्स दिखातादेता मन को ठेस ,आइना अक्स दिखाता || अर...