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sanjiv verma salil
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कुण्डलिया  *रूठी राधा से कहें, इठलाकर घनश्याम मैंने अपना दिल किया, गोपी तेरे नाम गोपी तेरे नाम, राधिका बोली जा-जा काला दिल ले श्याम, निकट मेरे मत आ, जाझूठा है तू ग्वाल, प्रीत भी तेरी झूठीठेंगा दिखा हँसें मन ही मन, राधा रूठी*कुंडलीकुंडल पहना...
 पोस्ट लेवल : kundaliya कुण्डलिया
sanjiv verma salil
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एक कुंडली- दो रचनाकार दोहा: शशि पुरवार रोला: संजीव *सड़कों के दोनों तरफ, गंधों भरा चिराग गुलमोहर की छाँव में, फूल रहा अनुरागफूल रहा अनुराग, लीन घनश्याम-राधिकादग्ध कंस-उर, हँसें रश्मि-रवि श्वास साधिकानेह नर्मदा प्रवह, छंद गाती मधुपों केगंधों भरे च...
sanjiv verma salil
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कुण्डलिया *आवारा मन ने कहा, लड़ ले आम चुनाव खास-खास हैं सड़क पर, सम हैं भाव-अभाव सम हैं भाव-अभाव, माँग लो माँग न चूको नोटा में मतदान, करो हर दल पर भूँको अब तक ठगता रहा, ठगाया अब बेचारा मन की कहे तरंग, न हो जन-गण बेचारा *** कहता साहूकार क्यों, मैं हूँ चौकीदार? स्वां...
shashi purwar
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१शहरों की यह जिंदगी, जैसे पेड़ बबूलमुट्ठी भर सपने यहाँ, उड़ती केवल धूलउड़ती केवल धूल, नींद से जगा अभागाबुझे उदर की आग, कर्म ही बना सुहागाकहती शशि यह सत्य, गूढ़ डगर दुपहरों कीकोमल में के ख्वाब, सख्त जिंदगी शहरों की२चाँदी की थाली सजी, फिर शाही पकवानमाँ बेबस लाचार थी, दंभ...
sanjiv verma salil
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दोहे*सकल सृष्टि कायस्थ है, सबसे करिए प्रेम कंकर में शंकर बसे, करते सबकी क्षेम*चित्र गुप्त है शौर्य का, चित्रगुप्त-वरदान काया स्थित अंश ही, होता जीव सुजान*महिमा की महिमा अमित, श्री वास्तव में खूब वर्मा संरक्षण करे,  रहे वीरता डूब*मित्र...
sanjiv verma salil
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दो कवि एक कुंडली नर-नारी *नारी-वसुधा का रहा, सदा एक व्यवहार ऊपर परतें बर्फ कि, भीतर हैं अंगार -संध्या सिंह भीतर हैं अंगार, सिंगार न केवल देखेंजीवन को उपहार, मूल्य समुचित अवलेखेंपूरक नर-नारी एक-दूजे के हों आभारीनर सम, बेहतर नहीं, नहीं कमतर है नार...
shashi purwar
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आंगन के हर फूल से,  करो न इतना मोह जीवन पथ में एक दिन, सहना पड़े बिछोह सहना पड़े बिछोह, रीत है जग की न्यारी होती हमसे दूर, वही जो दिल को प्यारी कहती शशि यह सत्य, रंग बदलें उपवन के फूल हुए सिरमौर, ना महकते आंगन के चाहे कितनी दूर...
 पोस्ट लेवल : कुण्डलियाँ
sanjiv verma salil
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कार्य शाला*तन की मनहर बाँसुरी, मन का मधुरिम राग।नैनों से मुखरित हुआ, प्रियतम का अनुराग।।  -मिथिलेश बड़गैयाँप्रियतम का अनुराग, सलिल सम प्रवहित होता।श्वास-श्वास में प्रवह,  सतत नव आशा बोता।।जान रहे मिथिलेश, चाह सिय-रघुवर-मन की। तज सिंहासन...
sanjiv verma salil
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एक रचनाघुटना वंदन*घुटना वंदन कर सलिल, तभी रहे संजीव।घुटने ने हड़ताल की, जीवित हो निर्जीव।।जीवित हो निर्जीव, न बिस्तर से उठने दे।गुड न रेस्ट; हो बैड, न चलने या झुकने दे।।छौंक-बघारें छंद, न कवि जाए दम घुट ना।घुटना वंदन करो, किसी पर रखो न घुटना।।*यायावर जी के घुटने को...
sanjiv verma salil
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कार्य शाला:दोहा से कुण्डलिया *बेटी जैसे धूप है, दिन भर करती बात।शाम ढले पी घर चले, ले कर कुछ सौगात।।  -आभा सक्सेना 'दूनवी' लेकर कुछ सौगात, ढेर आशीष लुटाकर।बोल अनबोले हो, जो भी हो चूक भुलाकर।। रखना हरदम याद, न हो किंचित भी हेटी। जा...