रेत के मरुस्थल-सा,  हृदय पर होता विस्तार, खो जाती है  जिसमें, स्नेह की कृश-धार, दरक जाती है,  इंसानियत, बंजर होते हैं,  चित्त के भाव, जज़्बात  में नमी, एहसास में होती, अपनेपन की कमी,&nb...