ब्लॉगसेतु

Noopur Shandilya
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सुबह से ही गहरे बादल घिरे हुए थे. सायली झटपट काम निबटा कर जल्दी घर जाना चाहती थी. इधर कुछ दिनों से झुटपुटा होने से पहले घर पहुँचने की कोशिश रहती थी उसकी. उसकी खोली तक पहुँचने के रास्ते में एक चाय की टपरी पर.. मरे कुछ आदमी आकर बैठने लगे थे एक दो महीने से ! बेहुदे कह...
 पोस्ट लेवल : कथा कोलाज
Noopur Shandilya
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पीला गेंदा, नारंगी गेंदा, मोगरा, रजनीगंधा, हरसिंगार, बेला, जूही और ये गुलाब !टिकुली फूली नहीं समा रही थी ! सात साल की इस नन्ही परी  के हाथों में फूलों से भरी टोकरी नहीं, फूलों की घाटी ही सिमट आई थी !वसंत पंचमी की मीठी बयार ने टिकुली को सुबह-सुबह टपली मार के जग...
 पोस्ट लेवल : कथा कोलाज
समीर लाल
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रेडियो पर गाना सुन रहे हैं कान में इयर फोन लगा कर:कहीं किसी रोज यूँ भी होताहमारी हालत तुम्हारी होतीजो रात हमने गुजारी मर केवो रात तुमने गुजारी होती!!कितनी गुलजार रात है आज रविवार की...बाहर बहुत कुड़कुड़ा देने वाली -१० ठंड है..सुनसान सड़क..बरफ की चादर ओढ़े हुए..घर के...
गौतम  राजरिशी
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हावड़ा से आने वाली राजधानी एक्सप्रेस ग़ज़ब ही विलंब से चल रही थी | इस बार की आयी बाढ़ कहीं रस्ते में रेल की पटरियों को भी आशिंक रूप से डुबो रही थी तो इस रस्ते की कई ट्रेनें धीमी रफ़्तार में अपने गंतव्य तक पहुँचने में अतिरिक्त समय ले रही थीं | गया स्टेशन पर प्रतीक्षारत य...
गौतम  राजरिशी
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हमारी नयी किताब आयी है | कहानियों की पहली किताब | हिन्दी-साहित्य में सेना और सैनिक हमेशा से एक अछूता विषय रहा है | गिनी-चुनी कहानियाँ हैं सैन्य-जीवन पर...गिने-चुने उपन्यास हैं | एक अदनी सी कोशिश है उसी कमी को थोड़ा कम करने की | कुछ कहानियाँ आपलोग इस ब्लौग पर पहले ही...
मुकेश कुमार
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क्लिक क्लिक क्लिक!कैमरे के शटर का क्लिकतीन अलग अलग क्षणसहज समेटे हुए परिदृश्य !पहली तस्वीरपूर्णतया प्राकृतिक व नैसर्गिककल कल करती जलधाराचहचहाती चिरैया, फुदकती गोरैयादूर तक दिखती हरियालीडूबता दमकता गुलाबी सूरजपैनोरमा मोड़ मेंखिंची गयी कैमरे की क्लिक !!दूसरा था कोलाजए...
राजीव कुमार झा
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.अगर  हम जिन्दगी को गौर से देखें तो यह एक कोलाज की तरह ही है. अच्छे -बुरे लोगों का साथ ,खुशनुमा और दुखभरे समय के रंग,और भी बहुत कुछ जो सब एक साथ ही चलता रहता है. कोलाज यानि ढेर सारी चीजों का घालमेल. एक ऐसा घालमेल जिसमें संगीत जैसी लयात्मकता हो ,...
 पोस्ट लेवल : कोलाज जिन्दगी
Satish Pancham
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“अब फिर चलूं इस कलमुही साईकिल लेकर घिरिर घिरिर रेंगाते हुए” .“तो क्या पहले नहीं जाते थे साईकिल लेकर ? किसने कहा था आपसे कि चुनाव लड़िये और साईकिल वाले से हारिये” ?“तो क्या कोई कहे तभी चुनाव लड़ा जाता है” ?“वो आप जानों, मना कर रही थी कि हाथी वाले के इहां से मत लड़िय...
 पोस्ट लेवल : कथा-कोलाज satire व्यंग्य