ब्लॉगसेतु

ANITA LAGURI (ANU)
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पूरी पृथ्वी में मानव जाति ही जीवित जीवों में &#23...
सुशील बाकलीवाल
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     प्रायः सभी एकल भारतीय परिवारों में यदि बच्चे बहुत छोटे न रहे हों और मुख्य गृहिणी नौकरी-पेशा न हो तो एक समस्या अक्सर सामने आती है और वो है पति के काम पर व बच्चों के अपने स्कूल-कॉलेज निकल जाने के बाद सबके बारे में सोचते रहना और उनकी वापसी की...
मुकेश कुमार
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अनंत तक पसरा ये अन्तरिक्षउनमें तैरते न जाने कितने सारे सौरमंडलसबका अलग अलग सूरजन जाने कितनी आकाशगंगाएंसबका अलग अलग वजूद और फिरअपनी अपनी तय कक्षा मेंपरिक्रमा करते ग्रह, उपग्रहतारे, धूमकेतु सब-सबलेकिन फिक्स रहता हैउन सब खगोलीय पिंडों के बीच का स्पेसविस्तार की हक़...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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मन में दबे हुए क्रोध को आजकल सडकों पर भीड़ बनकर चाहतों के शहर ख़्वाबों की गलियाँ विध्वंस करते हुए निकाला जा रहा है मनुष्य को ईश्वर ने दूसरों की पीड़ा को महसूसने अपने ज़मीर को जाग्रत रखने दिल दिया सांसारिक खेल...
जन्मेजय तिवारी
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                      नींद नहीं आ रही थी । करवट बदल-बदल कर उसे बुलाने की सारी कोशिशें बेकार गई थीं । अंततः बिस्तर को छोड़ देना ही मुझे उचित जान पड़ा । मैं घर से बाहर निकल आया और धीरे-धीरे सड़क पर बढ़ने लगा...
सुशील बाकलीवाल
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           इन  सूत्रों को पढ़ने के बाद पता चला कि सचमुच खुशहाल ज़िंदगी और शानदार मौत के लिए ये सूत्र बहुत ज़रूरी हैं...                ...
हंसराज सुज्ञ
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एक बार शीत ऋतु में राजा श्रेणिक अपनी पत्नी चेलना के साथ भगवान महावीर के दर्शन कर वापस महल की तरफ लौट रहे थे। रास्ते में एक नदी के किनारे उन्होंने एक मुनि को ध्यान में लीन देख। उन्हें देख कर रानी ने सोचा, धन्य हैं ये मुनि जो इतनी भयंकर सर्दी में भी निर्वस्त्र ध्यान...
हंसराज सुज्ञ
240
एक नगर में एक जुलाहा रहता था। वह स्वाभाव से अत्यंत शांत, नम्र एवं निष्ठावान था। क्रोध उसके स्वभाव में ही नहीं था। एक बार कुछ लड़कों को शरारत सूझी वे सब उस जुलाहे के पास यह सोचकर पहुँचे कि देखें इसे गुस्सा कैसे नहीं आता ?उन में एक लड़का धनवान माता-पिता का पुत्र था। वह...
डा.राजेंद्र तेला निरंतर
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ना जाने क्यों तुमने क्रोध को विवेक पर हावी होने दिया आसानी से कह दिया मुझ से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहते पर कहने से पहले सोचा नहींरिश्ता मेरा ही नहीं तुम्हारा भी टूटेगाहृदय मेरा ही नहीं तुम्हारा भी दुखी होगाकहने से पहले दो बार सोच लेते क्रोध ठंडा होने के बाद बैठ कर...
डा.राजेंद्र तेला निरंतर
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अगर सोच हो तंग धीरज ना हो संग क्रोध जीने का ढंग काजल की कोठरी खिड़की कपाट बंद जैसा हो जाता मन हर ओर अन्धेरा कर्म ना होते सफल जीवन रहता निष्फल© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर475-15-08--09-2014 जीवन,सोच,क्रोध,धैर्य,कर्म, धीरजDr.Rajendra Tela"Nirantar" "निरंतर" की कलम से.......