ब्लॉगसेतु

अनंत विजय
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कोरोना के संकट के दौरान पुस्तकें पढ़कर समय बिताना एक बेहतर विकल्प है। बाजार आदि भले ही खुल गए हैं लेकिन बहुत आवश्यक होने पर ही वहां जाना होता है। लोगों से मिलने-जुलने वाली संस्कृति पर भी फिलहाल विराम लगा हुआ है। पिछले करीब अस्सी दिन में कई किताबें पढ़ने का सुयोग बन...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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जामिया मिलिया इस्लामियाविश्वविद्यालय दिल्ली कीलायब्रेरी में दिल्ली पुलिस नेअपने बर्बर दुस्साहस के साथअध्ययनरत शिक्षार्थियों परक्रूरतम लाठीचार्ज कियाएक ओर जब दर्द से कराह रहे हैं युवातब समाज का एक तबकाअपनी अपार ख़ुशी ज़ाहिर कर रहा हैक्योंकि धर्म विशेष के लोगों कोपूर्व...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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अरे! सुनो विद्यार्थियो! क्यों सड़कों परअपना ख़ून बहा रहे हो अपनी हड्डियाँ तुड़वा रहे होअपनी खाल छिलवा रहे हो पुलिस की लाठियाँ खा रहे हो पुलिस की लातें खा रहे हो क्यों सामान के बोरे-सा ढोये जा रहे हो चार-छह बेरहम पुलिसकर्मियों के हाथोंक्यो...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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तिमिर भय नेबढ़ाया हैउजास से लगाव,ज्ञानज्योति नेचेतना से जोड़ातमस कास्वरूपबोध और चाव।घुप्प अँधकार मेंअमुक-अमुक वस्तुएँपहचानने का हुनर,पहाड़-पर्वतकुआँ-खाईनदी-नालेअँधेरे में होते किधर?कैसी साध्य-असाध्यधारणा है अँधेरा,अहम अनिवार्यता भी हैसृष्टि में अँधेरा।कृष्णपक्ष कीविकट...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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सुनो मेघदूत!अब तुम्हें संदेश कैसे सौंप दूँ, अल्ट्रा मॉडर्न तकनीकी से, गूँथा गगन ग़ैरत का गुनाहगार है अब, राज़-ए-मोहब्बत हैक हो रहे हैं!हिज्र की दिलदारियाँ, ख़ामोशी के शोख़ नग़्मे, अश्क़ में भीगा गुल-ए-तमन्ना, फ़स्ल-ए-बहार में, दिल की धड़क...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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 प्रकृति की, स्तब्धकारी ख़ामोशी की, गहन व्याख्या करते-करते, पुरखा-पुरखिन भी निढाल हो गये, सागर,नदियाँ,झरने,पर्वत-पहाड़, पोखर-ताल,जीवधारी,हरियाली,झाड़-झँखाड़,क्या मानव के मातहत निहाल हो गये?नहीं !...... कदापि नहीं !औद्योगिक क्राँति,पूँजी का...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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                                                                          &...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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उस दिन बिटिया नाराज़ हुई थी तब चौथी कक्षा में पढ़ती थी भूगोल की परीक्षा में नक़्शा बनाने के भी नम्बर थे नक़्शे बनाते-बनाते उसे गुस्सा आया मेरे पास आयी हाथ में थे कई काग़ज़ जिन पर बने थे कई नक़्शे लेकिन नहीं थे बनाने जैसे&n...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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विकास में पिछड़े तो आत्महीनताघर कर गयी विमर्श में पतन हुआ तो बदलाभाव और हिंसा मन में समा गयी  भूमंडलीकरण के मुक्त बाज़ार ने इच्छाओं के काले घने बादल अवसरवादिता की कठोर ज़मीन तैयार की सामाजिक मूल्यों कीनाज़ुक ज...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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पथरीले हठीले हरियाली से सजे पहाड़ ग़ाएब हो रहे हैं बसुंधरा के शृंगार खंडित हो रहे हैं एक अवसरवादी सर्वे के परिणाम पढ़कर जानकारों से मशवरा ले स्टोन क्रशर ख़रीदकर एक दल में शामिल हो गया चँदा भरपूर दिया संयोगवश /...