ब्लॉगसेतु

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--गुस्सा-प्यार और मनुहारआँखें कर देतीं इज़हार --नफरत-चाहत की भाषा काआँखों में संचित भण्डार--बिन काग़ज़ के, बिना क़लम केलिख देतीं सारे उद्गार--नहीं छिपाये छिपता सुख-दुखकरलो चाहे यत्न हजार--पावस लगती रात अमावसहो जातीं जब आँखें चार--नहीं जोत जिनकी आँखों मेंउनका ह...
गौतम  राजरिशी
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 थपेड़े समन्दर के सहता हुआ मैं किसी सैंड-कैसल सा ढहता हुआ मैं   दीवारों सी फ़ितरत मिली है मुझे भी कि रह कर भी घर में न रहता हुआ मैं   धुआँ है या शोला, जो दिखता ग़ज़ल में सुलगती कहानी है...कहता हुआ मैं   उधर हैं वो आँखें...इधर कोई दरिया यहाँ से वहाँ...
 पोस्ट लेवल : नीला नीला ग़ज़ल
sahitya shilpi
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ग़ज़ल:1  मेरे पास कितनी कहानी पड़ी है। लबों पर टिकी है जबानी पड़ी है।   कई बार होगी अभी तो मोहब्बत अभी यार पूरी जवानी पड़ी है।   उसे अब कहाँ कुछ बताना पड़ेगा वो लड़की तो पहले से मानी पड़ी है।   कहां तक बतायें उसे हाल ए दिल मिरे दिल पे कितनी निशानी पड़ी...
sahitya shilpi
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 पोस्ट लेवल : गौरव शुक्ला ग़ज़ल
sahitya shilpi
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--दर्द का सिलसिला दिया तुमनेआज रब को भुला दिया तुमने--हमने करना वफा नहीं छोड़ानफरतों का सिला दिया तुमने--खिलती चम्पा को नोंचकर फेंकाफिर नया गुल खिला दिया तुमने--हमको आब-ए-हयात के बदलेफिर हलाहल पिला दिया तुमने--मौत माँगी थी हमने मौला सेफिर से मुर्दा जिला दिया तुमने-...
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हिम्मत अभी नहीं हारी हैजंग ज़िन्दगी की जारी है--मोह पाश में बँधा हुआ हूँये ही तो दुनियादारी है--ज्वाला शान्त हो गई तो क्यादबी राख में चिंगारी है--किस्मत के सब भोग भोगनाइस जीवन की लाचारी है--चार दिनों के सुख-बसन्त मेंमची हुई मारा-मारी है--हाल भले बेहाल हुआ होजान सभी...
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मुफ्त में मिलती नहीं सौगात हैंतंज करने से बिगड़ती बात हैंहो सके तो वक्त से कुछ सीख लो सामने आकर खड़ी अब मात हैं सोचकर चौपाल में मुँह खोलनातल्खियाँ देतीं बड़ा आघात हैं  सूफियों को ध्यान रखना चाहिएयूँ नहीं मिलती यहाँ खैरात हैं  मुफलिसी में भूख लगत...
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--बहता जल का सोता है हाथ-हाथ को धोता है --फूल कहाँ से पायेगा वो जो काँटों को बोता है --जिसके पास अधिक है होता वही अधिकतर रोता है --साथ समय के सब सम्भव है क्यों धीरज को खोता है  --फसल उगेगी कैसे अच्छी नहीं खेत को जोता है&...
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--भाव अपनी ग़ज़ल में कैसे भरूँशब्द को अपने गरल कैसे करूँ--फँस गया अपने बुने ही जाल मेंरास्ता अपना सरल कैसे करूँ--तिश्नगी से कण्ठ सूखा जा रहाआचमन देकर तरल कैसे करूँ--ज़िन्दगी में चाह है, ना राह हैचश्म को अपनी सजल कैसे करूँ--तन-बदन में पड़ गयीं है झुर्रियाँ“रूप” को अ...