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रविशंकर श्रीवास्तव
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रविशंकर श्रीवास्तव
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क्षमा करें तुफैलजी! [ ग़ज़ल-संग्रह ‘चुभन’ की समीक्षा के बहाने एक बहस ] - रमेशराज ------------------------------------------------------------ तुफैलजी हास्य-व्यंग्य के साथ-साथ ग़ज़ल की उत्तम नहीं ‘सर्वोत्तम पत्रिका’ ‘लफ्ज़’ निकालते हैं। जाहिर है पत्रिका में प्रकाशि...
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रविशंकर श्रीवास्तव
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तेवरी एक ऐसी विधा है जिसमें जन-सापेक्ष सत्योन्मुखी संवेदना अपने ओजस स्वरूप में प्रकट होती है। तेवरी का समस्त चिन्तन-मनन उस रागात्मकता की रक्षार्थ प्रयुक्त होता है, जो अपने सहज-सरल रूप में नैतिक, निष्छल, निष्कपट और प्राकृतिक है। रागात्मकता की यह प्राकृतिकता आपसी प्...
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हिन्दी में ग़ज़ल अपने विशुद्ध शास्त्रीय सरोकारों के साथ कही या लिखी जाए, इस बात पर किसे आपत्ति हो सकती है। ग़ज़ल का ग़ज़लपन यदि उसके सृजन में परिलक्षित नहीं होगा तो उसे ग़ज़ल मानने या मनवाने की जोर-जबरदस्ती केवल धींगामुश्ती ही कही जाएगी। हिन्दी में थोक के भाव ग़ज़...
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रविशंकर श्रीवास्तव
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प्रेमिका के आगमन की प्रतीक्षा में आँखों को दीप-सा जलाये रखना और इन्हीं दीप-सी जलती हुई प्रतीक्षारत आँखों से वर्ग-संघर्ष को उभारना, अँधेरे से उल्लू [शोषक] के तीर मारना है। यह कैसे होता है, एक ग़ज़ल के शे’र प्रस्तुत हैं- जलें निरंतर राह में इन आँखों के दीप, कब आओगे...
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हिन्दी में ग़ज़लकारों की एक पूरी की पूरी जमात इस बात का पूरे जोर-शोर के साथ प्रचार कर रही है कि अब ग़ज़ल किसी सुहागरात की न तो चूडि़यों की खन-खन है और न किसी प्रेमिका का आलिंगन है। न एकांत में चोरी-चोरी छुपकर लिया गया चुम्बन है। इसे न अब इश्क का बुखार है, न हुस्न...
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हिन्दी ग़ज़़लकारों की अंधी रति - रमेशराज +|| क्या ग़ज़ल एक फ्रेम का नाम है ?? || ग़ज़ल विशेषांकों की कड़ी में अपनी भी एक कड़ी जोड़ते हुए संपादक श्री श्याम अंकुर ने ‘सौगात’ का अप्रैल-2009 अंक ‘ग़ज़ल-विशेषांक’ के रूप में निकाला। अन्य ग़ज़ल विशेषांकों की तरह यहाँ भ...
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