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sanjiv verma salil
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एक रचना दिल्लीवालो *दिल्लीवालो! भोर हुई पर जाग न जानाघुली हवा में प्रचुर धूल हैजंगल काटे, पर्वत खोदेसूखे ताल, सरोवर, पोखर नहीं बावली-कुएँ शेष हैं हर मुश्किल का यही मूल है बिल्लीवालो!दूध विषैला पी मत जाना कल्चर है होटल में खाना सद्विचार कह दक़ियानूसी चीर-फाड़कर वस्त्र...
 पोस्ट लेवल : नवगीत दिल्लीवालो
sanjiv verma salil
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नवगीत *लगें अपरिचितसारे परिचितजलसा घर मेंहै अस्पृश्य आजकल अमिधानहीं लक्षणा रही चाह मेंस्वर्णाभूषण सदृश व्यंजनाबदल रही है वाह; आह मेंसुख में दुःख को पाल रही हैश्वास-श्वास सौतिया डाह मेंहुए अपरिमितअपने सपनेकर के कर मेंसत्य नहीं है किसी काम का नाम न लेना भूल...
 पोस्ट लेवल : नवगीत लगें अपरिचित
sanjiv verma salil
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नवगीत सुनो शहरियों!संजीव वर्मा 'सलिल'*सुनो शहरियों! पिघल ग्लेशियर सागर का जल उठा रहे हैं जल्दी भागो। माया नगरी नहीं टिकेगी विनाश लीला नहीं रुकेगी कोशिश पार्थ पराजित होगा श्वास गोपिका पुन: लुटेगी बुनो शहरियों !अब मत सपने&...
 पोस्ट लेवल : नवगीत सुनो शहरियों!
sanjiv verma salil
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कृति चर्चा -'अपने शब्द गढ़ो' तब जीवन ग्रन्थ पढ़ो आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'*[कृति विवरण - अपने शब्द गढ़ो, गीत-नवगीत संग्रह, डॉ. अशोक अज्ञानी, प्रथम संस्करण २०१९, आईएसबीएन ९७८-८१-९२२९४४-०-७, आकार २१ से.मी. x १४ से.मी., आवरण पेपरबैक बहुरंगी, पृष्ठ १३८, मूल्य १५०/-,...
sanjiv verma salil
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गीत *जो चाहेंगेवह कर लेंगेछू लेंगेकदम रोक लेनहीं कहीं भीकोई ऐसा पाश।*शब्द निशब्ददेख तितली कोभरते नित्य उड़ान।रुकेंचुकें झट क्यों न जूझतेमुश्किल से इंसान?घेरभले लेंशशि को बादलउड़ जाएँगे हार।चटकचाँदनीफैला भू परदे धरती उजियार।करे सलिल को रजताभित मिल बिछुड़ न जाए काश। क...
 पोस्ट लेवल : गीत
sanjiv verma salil
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कृति चर्चा :'चुप्पियों को तोड़ते हैं' नव आशाएँ जोड़ते नवगीत चर्चाकार : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'[कृति परिचय - चुप्पियों को तोड़ते हैं, नवगीत संग्रह, योगेंद्र प्रताप मौर्य, प्रथम संस्करण २०१९, ISBN ९७८-९३-८९१७७-८७-९, आवरण पेपरबैक, बहुरंगी, २०.५ से. मी .x १४से...
sanjiv verma salil
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कृति चर्चा :"गाँव देखता टुकुर-टुकुर" शहर कर रहा मौज आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'*[कृति विवरण - गाँव देखता टुकुर-टुकुर, नवगीत संग्रह, नवगीतकार - प्रदीप कुमार शुक्ल, प्रथम संस्करण, वर्ष २०१८, आवरण - बहुरंगी, पेपरबैक, आकार - २१ से. x १४ से., पृष्ठ १०७, मूल्य ११०/-, प्रक...
shashi purwar
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१ नज्म के बहानेयाद की सिमटी हुई यह गठरियाँ खोल कर हम दिवाने हो गए रूह भटकी कफ़िलों में इस तरह नज्म गाने के बहाने हो गए। बंद पलकों में छुपाया अश्क को सुर्ख अधरों पर थिरकती चांदनी प्रीत ने भीगी दुशाला ओढ़कर फिर जलाई बंद हिय में अलगनी इश्क के ठहरे उजाले पाश में धार स...
 पोस्ट लेवल : नवगीत गीत प्रेम
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--है नशा चढ़ा हुआ, खुमार ही खुमार है।तन-बदन में आज तो, चढ़ा हुआ बुखार है।।--मुश्किलों में हैं सभी, फिर भी धुन में मस्त है,ताप के प्रकोप से, आज सभी ग्रस्त हैं,आन-बान, शान-दान, स्वार्थ में शुमार है।तन-बदन में आज तो, चढ़ा हुआ बुखार ह...
 पोस्ट लेवल : गीत चढ़ा हुआ बुखार है
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--जन्मदिवस चाचा नेहरू का, बच्चों भूल न जाना।ठाठ-बाट को छोड़ हमेशा, सादा जीवन अपनाना।।--नित्य-नियम से सदा सींचना, बगिया की फुलवारी।मत-मजहब के गुलदस्ते सी, वसुन्धरा है प्यारी।अपनी इस पावन धरती पर, वैमनस्य मत उपजाना। ठाठ-बाट को...