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sanjiv verma salil
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शारद वंदनाछंद - हरिगीतिकामापनी - लघु लघु गुरु लघु गुरु*कर शारदे! इतनी कृपा, नित छंद का, नव ग्यान देरस-भाव का, लय-ताल का, सुर-तान का, अनुमान देसपने पले, शुभ मति मिले, गति-यति सधे, मुसकान देविपदा मिटे, कलियाँ खिलें, खुशियाँ मिलें, नव गान दे*संजीव६-६-२०२०http://divyan...
ऋता शेखर 'मधु'
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(हे! अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।)हे! अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।आद्या जया दुर्गा स्वरूपा, शक्ति का आधार हो।*शिव की प्रिया नारायणी, हे!, ताप हर कात्यायिनी।तम की घनेरी रैन बीते, मात बन वरदायिनी।।।भव में भरे हैं आततायी, शूल तुम धारण करो।हुंका...
ऋता शेखर 'मधु'
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 छंद- शक्ति /वाचिक भुजंगी 122 122 122 12****************************जिसे चाहिये जो दिया है सदामिला है हमें जो लिया है सदान रखते शिकायत न शिकवा कभीसुधा संग विष भी पिया है सदालुभाते नहीं रूप दौलत कभीहृदय से गुणों को जिया है सदासमेकित हुआ नाद ओंकार मेंभ्रमर योग ह...
ऋता शेखर 'मधु'
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ऋतुराज की आहट हुई है, माघ का विस्तार है| माँ शारदे ! घर में पधारो, पंचमी त्योहार है||१|| * है राह भीषण ज़िन्दगी की, पग कहाँ पर हम धरें| मझधार में नौका फँसी है, पार कैसे हम करें || तूफ़ान में पर्वत बनें हम, शक्ति इतनी दो हमें | बन कर चरण-सेवी रहें हम, भक्ति भी दे दो...
ऋता शेखर 'मधु'
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गीतिका ...समसामयिकमोह बढ़े जब-जब धन से तब, ईश्वर ही सिखलायेगा | अपना घर अपना रिश्ता ही, काम हमेशा आयेगा ||१|| जन्मभूमि से अपनापन ही, गाँव सभी को ले आया | ‘कोविड के कारण लौटे थे’, इतिहास यही बतलायेगा||२|| अपनी छत अपनी होती है, चाहे होते छेद कई| यही बात समझाने को तो,...
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ऋता शेखर 'मधु'
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गीतिकाआधार छन्द - रजनी (मापनीयुक्त मात्रिक) मापनी - गालगागा गालगागा गालगागा गा 2122   2122   2122 2 समान्त - आर, पदान्त - को देखो लिख रहे जो गीतिका उस सार को देखो लेखनी से उठ रहे उद्गार को देखो हो रहे हैं शब्द हर्षित भाव बहने लगे हर्ष में छुपते...
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ऋता शेखर 'मधु'
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विधा:-गीतिका आधार छंद-रजनी मापनी- २१२२ २१२२ २१२२ २ ======================= फूल है अपनी जगह खुशबू रुहानी है | झूमती गाती हवा लाती रवानी है |१| मौत के डर से न जीना छोड़ना साथी प्राण का तन से मिलन जीवन कहानी है|२| बोलते हैं जब पपीहे प्रीत के सुर में वह मिलन की रागिनी...
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--सुबह होगी तो सूरज निकल जायेगावक्त के साथ सब कुछ बदल जायेगा--जिन्दगी में कभी हार मत माननाधूप में बर्फ सारा पिघल जायेगा--दिल की कोटर में भी तो जलाओ दियादेखकर रौशनी मनल मचल जायेगा --पोथियाँ तो जगत की पढ़ो प्यार सेदम्भ का आशियाँ खुद दहल जायेगा--जूझ...
sanjiv verma salil
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एक रचना *श्वास श्वास समिधा है आस-आस वेदिका *अधरों की स्मित के पीछे है दर्द भी नयनों में शोले हैं गरम-तप्त, सर्द भी रौनकमय चेहरे से पोंछी है गर्द भी त्रास-त्रास कोशिश है हास-हास साधिका *नवगीती बन्नक है जनगीति मन्नत मेहनत की माटी में सीकर मिल जन्नत करना है मंज़िल को ध...
sanjiv verma salil
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ॐ पुरोवाक आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'*विश्ववाणी हिंदी का साहित्य सृजन विशेषकर छांदस साहित्य इस समय संक्रमण काल से गुजर रहा है। किसी समय कहा गया था -  सूर सूर तुलसी ससी, उडुगन केसवदास अब के कवि खद्योत सम जहँ-तहँ करात प्रकास जिन्हें '...
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