ब्लॉगसेतु

Yashoda Agrawal
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हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करतेवक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते जिस की आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकनऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करतेलग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दोऐसे दरिया का कभी रुख़ नहीं मोड़ा करतेजागने पर भी नहीं आंख से गिरतीं...
 पोस्ट लेवल : गुलज़ार
Yashoda Agrawal
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ऐसा ख़ामोश तो मंज़र न फ़ना का होता मेरी तस्वीर भी गिरती तो छनाका होता यूँ भी इक बार तो होता कि समुंदर बहता कोई एहसास तो दरिया की अना का होता साँस मौसम की भी कुछ देर को चलने लगती कोई झोंका तिरी पलकों की हवा का होता काँच के पार तिरे हाथ...
 पोस्ट लेवल : गुलज़ार
Rajeev Upadhyay
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मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते जब कोई तागा टूट गया या ख़तम हुआ फिर से बाँध के और सिरा कोई जोड़ के उसमें आगे बुनने लगते हो तेरे इस ताने में लेकिन इक भी गाँठ गिरह बुनकर कीदेख नहीं सकता है कोई&nb...
Yashoda Agrawal
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बस एक लम्हे का झगड़ा थादर-ओ-दीवार पे ऐसे छनाके से गिरी आवाज़जैसे काँच गिरता हैहर एक शय में गईउड़ती हुई, चलती हुई, किरचेंनज़र में, बात में, लहजे में,सोच और साँस के अन्दरलहू होना था इक रिश्ते कासो वो हो गया उस दिनउसी आवाज़ के टुकड़े उठा के फर्श से उस शबकिसी ने काट ली...
 पोस्ट लेवल : कविताकोश गुलज़ार
Yashoda Agrawal
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खाली कागज़ पे क्या तलाश करते हो?एक ख़ामोश-सा जवाब तो है।डाक से आया है तो कुछ कहा होगा"कोई वादा नहीं... लेकिनदेखें कल वक्त क्या तहरीर करता है!"या कहा हो कि... "खाली हो चुकी हूँ मैंअब तुम्हें देने को बचा क्या है?"सामने रख के देखते हो जबसर पे लहराता शाख का सायाहाथ हिल...
 पोस्ट लेवल : कविताकोश गुलज़ार
Yashoda Agrawal
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आकाश इतना छोटा तो नहीऔर इतना थोड़ा भी नही .सारी ज़मीन ढांप ली साहिबमेरा इतना सा आँगनक्यूँ नही ढांप ले सकता ..दोपहर होने को आईऔर इक आरज़ूधूप से भरे आँगन मेंछाँव के छीटे फेंकती हैऔर कहती हैये आँगन मेरा नही ..यहाँ तो बसपाँव रखने को छाँव चाहिए मुझे ..ये घर भी मेरा नहीम...
Yashoda Agrawal
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उस रात बहुत सन्नाटा थाउस रात बहुत खामोशी थीसाया था कोई ना सरगोशीआहट थी ना जुम्बिश थी कोईआँख देर तलक उस रात मगरबस इक मकान की दूसरी मंजिल परइक रोशन खिड़की और इक चाँद फलक परइक दूजे को टिकटिकी बांधे तकते रहेरात  चाँद  और  मैं  तीनो  ही  बं...
Yashoda Agrawal
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एक नज़्म मेरी चोरी कर ली कल रात किसी नेयहीं पड़ी थी बालकनी मेंगोल तिपाही के ऊपर थीव्हिस्की वाले ग्लास के नीचे रखी थीनज़्म के हल्के हल्के सिप मैंघोल रहा था होठों मेंशायद कोई फोन आया थाअन्दर जाकर लौटा तो फिर नज़्म वहां से गायब थीअब्र के ऊपर नीचे देखासूट शफ़क़ की ज़ेब...
Yashoda Agrawal
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जिहाल-ए-मिस्कीं मुकों बा-रंजिश, बहार-ए-हिजरा बेचारा दिल है,सुनाई देती हैं जिसकी धड़कन, तुम्हारा दिल या हमारा दिल है।वो आके पेहलू में ऐसे बैठे, के शाम रंगीन हो गयी हैं,ज़रा ज़रा सी खिली तबियत, ज़रा सी ग़मगीन हो गयी हैं।कभी कभी शाम ऐसे ढलती है&nbs...
 पोस्ट लेवल : गुलज़ार
Rajeev Upadhyay
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चौक से चलकर, मंडी से, बाज़ार से होकरलाल गली से गुज़री है कागज़ की कश्तीबारिश के लावारिस पानी पर बैठी बेचारी कश्तीशहर की आवारा गलियों से सहमी-सहमी पूछ रही हैं हर कश्ती का साहिल होता है तोमेरा भी क्या साहिल होगा?एक मासूम से बच्चे नेबेमानी को मानी देकररद्दी के का...
 पोस्ट लेवल : कविता गुलज़ार