ब्लॉगसेतु

Yashoda Agrawal
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एक सिकंदर था पहले, मै आज सिकंदर हूँ अपनी धुन में रहता हूँ, मै मस्त कलंदर हूँ ताजमहल पे बैठ के मैंने ठुमरी-वुमरी गाई शाहजहाँ भी जाग गए, आ बैठे ओढ़ रजाई मै जितना ऊपर दीखता हूँ उतना ही अन्दर हूँ एक सिकंदर था पहले, मै आज सिकंदर हूँ कार्ल मा...
 पोस्ट लेवल : जख़ीरा गुलज़ार
Yashoda Agrawal
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बुरा लगा तो होगा ऐ खुदा तुझे,दुआ में जब,जम्हाई ले रहा था मैं--दुआ के इस अमल से थक गया हूँ मैं !मैं जब से देख सुन रहा हूँ,तब से याद है मुझे,खुदा जला बुझा रहा है रात दिन,खुदा के हाथ में है सब बुरा भला--दुआ करो !अजीब सा अमल है ये ये एक फ़र्जी गुफ़्तगू,और एकतरफ़ा-...
 पोस्ट लेवल : गुलज़ार
Yashoda Agrawal
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बुरा लगा तो होगा ऐ खुदा तुझे,दुआ में जब,जम्हाई ले रहा था मैं--दुआ के इस अमल से थक गया हूँ मैं !मैं जब से देख सुन रहा हूँ,तब से याद है मुझे,खुदा जला बुझा रहा है रात दिन,खुदा के हाथ में है सब बुरा भला--दुआ करो !अजीब सा अमल है ये ये एक फ़र्जी गुफ़्तगू,और एकतरफ़ा-...
 पोस्ट लेवल : गुलज़ार
शिवम् मिश्रा
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पाओलो कोएल्हो कह गये हैं कि अगर आप किसी को बहुत सिद्दत से चाहते हैं त सारा कायनात उसको आपको मिलाने का साजिस में जुट जाता है. एही बतवा साहरुख खान भी एगो सिनेमा में बोल गये. मगर ई सब एतना आसान भी नहीं होता है. आज से 18 साल पहले हम जिनके फैन हैं और जिनको हम अपना गुरु...
Ravindra Pandey
480
मेरी खामोशियाँ ही अब, मेरी बातें सुनाती हैं,दीवाना बन के तन्हाई, वो देखो गीत गाती हैं...कभी गुजरा था राहों से, मंज़िल की चाहत में,वही राहें पकड़ बाहें, मुझे मंज़िल दिखाती हैं...वक़्त ने करवट, बदल क्या ली मेरे मालिक,ख़ुशी बेताब मिलने को, शोहरत झूम जाती हैं...कभी मज़बूर थी...
Shahid Ajnabi
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किताबें झांकती हैं बंद अलमारी के शीशों सेबड़ी हसरत से तकती हैं महीनों अब मुलाकातें नहीं होती जो शामें इनकी सोहबतों में कटा करती थीं, अब अक्सर गुज़र जाती हैं 'कम्प्यूटर' के पर्दों पर बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें... इन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई हैं,बड़ी...
 पोस्ट लेवल : गुलज़ार साब
Shahid Ajnabi
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गुलज़ार साब !! क्या लिखूं , आपके लिए लफ्ज़ भी कम पड़ जाएँ....आप मेरे दिल के करीब हैं... रगों में दौड़ते हैं आपके अल्फाज़. ज़िन्दगी जीने का सलीका देते हैं आप. आपकी लिखावट रूह को ऐसे तस्कीन पहुंचाती है...जैसे किसी ने बर्फ का टुकड़ा रख दिया हो. क्या बधाईयाँ , क्या शुभकामन...
 पोस्ट लेवल : गुलज़ार साब
शिवम् मिश्रा
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हम जब छोटे थे तो हर इतवार को जंगलबुक आता था, तब तक हम कोनो गुलज़ार-उलजार को नहीं जानते थे.... लेकिन हमको ऊ चड्ढी पहन के फूल खिला है वाला गाना बहुत अच्छा लगता था.... मतलब एकदम डांस करने का फीलिंग आता था, अब हम लोग तो अइसने गाना पे डांस करते थे ऊ वखत... तब तक उन्हो...
शेखर सुमन
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ये दुनिया फरेबी है बहुत और हम हर किसी पर ऐतबार करते जाते हैं... कोई कल कह रहा था एक नीले रेगिस्तान से बारिश की बूँदें टपकती हैं,  आखें बंद करके महसूस करने की कोशिश की तो ऐसा बवंडर आया जो मेरे कई सपनों को रेत के ज़र्रे की तरह उड़ा कर ले गया... सेहरा की गीली रेत...
शिवम् मिश्रा
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पिछले साल भर ज़िन्दगी के कई शेड्स देखने को मिले. कभी लगा कि ज़िन्दगी बड़ी रंगीन है, फिर लगा नहीं, रंगीन नहीं – ब्लैक ऐण्ड व्हाइट है. फिर अपनी सोच पर हंसी आई कि चश्मा लगाकर दुनिया देखना और अपना फ़ैसला सुना देना, कहाँ तक मुनासिब है. जब खुशी का चश्मा लगाया तो गुजरात की हर...