ब्लॉगसेतु

Roshan Jaswal
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आसान  नहीं   मेरा   सफर  देख  रही  हूँकुछ छाँव मिले अब वो शजर देख रही हूँहाँ बादे  सबा  को  में जिधर देख रही हूंखुशबू लिए महकी सी सहर देख रही हूँमुश्किल है बहुत हिज्र में दिल को मिले आरामउठती  है जो ...
 पोस्ट लेवल : गज़ल कवितायें
Ravindra Prabhat
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।। ग़ज़ल।।- रवीन्द्र प्रभातगमजदा है माहौल बहुत आहट बनाए रक्खो।बच्चों के लिए अपनी मुस्कुराहट बनाए रक्खो।भूख से लड़कर हम जी लेंगे कुछ दिन जरूर - मगर ए दोस्त तिश्नगी की तरावट बनाए रक्खो।स्याह अंधेरों में उम्मीदों की सुबह ढूढों मगर- इन अंधेरों के खिलाफ बगावत...
 पोस्ट लेवल : गजल गज़ल गज़लें ग़ज़ल
Rajeev Upadhyay
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आप की याद आती रही रात भर चश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रात भर रात भर दर्द की शम्अ जलती रही ग़म की लौ थरथराती रही रात भर बाँसुरी की सुरीली सुहानी सदा याद बन बन के आती रही रात भर याद के चाँद दिल में उतरते रहे चाँदनी जगमगाती रही रात भर कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा कोई आ...
Rajeev Upadhyay
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काजू भुने प्लेट में विस्की गिलास मेंउतरा है रामराज विधायक निवास में।पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैतइतना असर है खादी के उजले लिबास में।आजादी का वो जश्न मनाएँ तो किस तरहजो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में।पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा देंसंसद बदल गई है यहाँ की नखा...
 पोस्ट लेवल : अदम गोंडवी कविता गज़ल
Rajeev Upadhyay
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मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते जब कोई तागा टूट गया या ख़तम हुआ फिर से बाँध के और सिरा कोई जोड़ के उसमें आगे बुनने लगते हो तेरे इस ताने में लेकिन इक भी गाँठ गिरह बुनकर कीदेख नहीं सकता है कोई&nb...
Rajeev Upadhyay
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बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता॥सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता॥वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता॥मैं अपनी ह...
Rajeev Upadhyay
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घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगेहर तरफ़ तेज़ हवाएँ हैं बिखर जाओगे।इतना आसाँ नहीं लफ़्ज़ों पे भरोसा करनाघर की दहलीज़ पुकारेगी जिधर जाओगे।शाम होते ही सिमट जाएँगे सारे रस्तेबहते दरिया से जहाँ होगे ठहर जाओगे।हर नए शहर में कुछ रातें कड़ी होती हैंछत से दीवारें जुदा ह...
Rajeev Upadhyay
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ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं, और क्या जुर्म है पता ही नहीं।इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं, मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं| ज़िन्दगी! मौत तेरी मंज़िल है दूसरा कोई रास्ता ही नहीं।सच घटे या बड़े तो सच न रहे, झूठ की कोई इन्तहा ही नहीं।ज़िन्द...
Rajeev Upadhyay
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धूप में निकलो घटाओं मेंनहाकर देखोज़िन्दगी क्या है, किताबों कोहटाकर देखो।सिर्फ आँखों से ही दुनियानहीं देखी जाती दिल की धड़कन को भी बीनाईबनाकर देखो।पत्थरों में भी ज़बां होती हैदिल होते हैंअपने घर के दरो-दीवार सजाकर देखो।वो सितारा है चमकने दोयूं ही आँखों मेंक्य...
Rajeev Upadhyay
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ऐसा लगता है ज़िन्दगी तुम होअजनबी जैसे अजनबी तुम हो।अब कोई आरज़ू नहीं बाकीजुस्तजू मेरी आख़िरी तुम हो।मैं ज़मीं पर घना अँधेरा हूँआसमानों की चांदनी तुम हो।दोस्तों से वफ़ा की उम्मीदेंकिस ज़माने के आदमी तुम हो।---------------------बशीर बद्रसाभार: कविता कोश
 पोस्ट लेवल : गज़ल बशीर बद्र