ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
152
दिल्ली। एक जनवरी, दो हज़ार पंद्रह। रज़ाई में बैठे। पैर में मोज़े पहने। वक़्त सुबह के दस बजकर बीस मिनट। कभी-कभी हम बहुत सारी बातें खुद से करते रहते हैं जिनका हमसे बाहर कोई मतलब नहीं होता। हम ऐसे ही कहीं किसी खाली कमरे में बैठे होते हैं। आहिस्ते से अपनी डायरी में बेतरतीब...
Shachinder Arya
152
आज दरी पर नई चादर बिछी हुई है। सुबह से ही घर से गेंदे के फूलों की ख़ुशबू आ रही थी। यह किसी बाहर से आने वाले मेहमान के लिए नहीं है। आज शादी के बाद गाँव से पहली बार बड़े लड़के की बहू आ रही है। लड़का अभी पिछले हफ़्ते लौटा है। नौकरी अभी नहीं है। सालभर में हो जाएगी। ऐसा घर म...