ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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इन दीवारों के बीच रहते-रहते वह इतना बड़ा हो गया कि घर में होता तो कभी बाहर निकलने के एहसास से नहीं भर पाता। वह चुप रहकर इन दीवारों को सुनने की कोशिश करता। तब उसे एक धुन सुनाई देती। धीमे-धीमे। आहिस्ता-आहिस्ता। जिधर से वह आवाज़ आती, वह उस तरफ़ अपनी थाली घुमा लेता। प्या...
Shachinder Arya
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जिस उम्र में बाबा हमारी उम्र के रहे होंगे, तब पता नहीं कितने गरीब रहे होंगे। कहते हैं, गरीबी एक दिन सबको लील जाती है। यही आज सुबह उन्हे अपने साथ कहीं ले गयी है और अभी तक उन्हे वापस नहीं लाई है। घूमने के शौक़ीन तो वे शुरू से ही रहे हैं, चल पड़े होंगे। बेधड़क। बिन सोचे...
Shachinder Arya
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यह बात मुझे बहुत साल बीत जाने के बाद समझ आई। या इसे ऐसे कहें के उन बातों को समझने लायक समझ उमर के साथ ही आती। उससे पहले समझकर कुछ होने वाला भी नहीं था। मौसी हमारी मम्मी से छोटी थीं या बड़ी कोई फरक नहीं पड़ता। मैं बहुत छोटा रहा होऊंगा, जब एकदिन वह मर गईं। मेरे हिस्से...
Shachinder Arya
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बचपन की यादों में सबसे अनछुई याद है नानी के घर की। हमलोग इसी मौसम में झुलसती गरमियाँ अपने गाँव में बिताने हरसाल लौट आते। वहाँ हमें छोड़कर सब रहा करते। वहाँ बस, हम ही नहीं हुआ करते। पता नहीं हम कितने छोटे रहे होंगे जब पापा हीरो मजेस्टिक खरीदकर लाये। शायद मेरे मुंडन क...
Shachinder Arya
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1. खाली पन्ने डायरी। आखिरी पन्ना। तारीख़ चौबीस अप्रैल। इसके बाद के सारे पन्ने खाली। बिलकुल सफ़ेद। आज कितने दिन हो गए? अभी गिने नहीं। पर तीन दिन बाद पूरा महिना हो जाएगा। कहीं कुछ नहीं लिखा। ऐसा कैसे हो गया। पता नहीं। बस लगता है, जैसे दिनों को रात के पहिये लग गए हों। स...
Shachinder Arya
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तबीयत अब ठीक है। वो जैसे ही मौसम बदलता है, सबसे पहले मुझमे दिखने लगता है। हम कभी कुतुब के बाहर बची रह गयी जगहों पर नहीं जा पाये। जमाली-कमाली भी उनमें से एक है और भी पता नहीं ऐसे कितनी जगहें होंगी कहाँ-कहाँ। फ़िर दिल्ली का यह मौसम तो माशा अल्लाह। इधर अप्रैल पिछली बार...
Shachinder Arya
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मेल से आई चिट्ठी जादा सबर और वक़्त मांगती है, लोग कहीं अरझे नहीं रहना चाहते होंगे। शायद इसलिए हमारी दुनिया इससे इससे बचती रही होगी। पर मुझे आश्चर्य है कि आप कैसे वहाँ तक पहुँच गईं कि मैं इतना लिखते हुए भी चुप्पा किस्म का हूँ? बहुत मानीखेज लगा मुझे। पता नहीं यह क्या...
Shachinder Arya
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वह खाली कमरे का एहसास अपने अंदर भरकर पीछे कई मिनट से अपनी डायरी में छिपाये उस ख़त के बार में सोचता रहा। वह कुछ नहीं कर पाया। ऐसा सोच कर फ़िर कुर्सी में धँस गया। छतपंखे की फाँकें उसके अंदर निकाल आयीं। वह रोने को हुआ, पर रो न सका। इधर कुछ नींद में जाने से पहले के ख़यालो...
Shachinder Arya
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वह खाली कमरे का एहसास अपने अंदर भरकर पीछे कई मिनट से अपनी डायरी में छिपाये उस ख़त के बार में सोचता रहा। वह कुछ नहीं कर पाया। ऐसा सोच कर फ़िर कुर्सी में धँस गया। छतपंखे की फाँकें उसके अंदर निकाल आयीं। वह रोने को हुआ, पर रो न सका। इधर कुछ नींद में जाने से पहले के ख़यालो...
Shachinder Arya
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ऐसी रात फ़िर कभी न आए। पूरी रात मम्मी के बाएँ पैर में दर्द इतना असहनीय बना रहा कि एक पल के लिए भी कहीं सुकून नहीं मिला। पैर फैला लेना तो दूर की बात है। रह रहकर उस अँधेरे कमरे में रोने को हो आता। कि मम्मी का पैर सवा नौ बजे के बाद ऐसा होता रहा। ग्यारह बजे बिजली की तरह...