ब्लॉगसेतु

ऋता शेखर 'मधु'
120
1चाँदनी युक्तगर्वीला रूप तेरासम्पूर्ण तुमआज की राततीन रंग की चुन्नीओढ़ ली मैंनेचन्दा, बता दे जराकहाँ है मीत मेरा।2खिलखिलाताचन्द्रमा रुपहलामुग्धा नायिकापी के आलिंगन मेंघूँट घूँट पी रहीअमृत धारा।3तुम्हे सतानेछुप जाती चाँदनीतड़पे तुमअमा में सारी रातऐ चाँदकभी तुम भी तो क...
sanjiv verma salil
7
षट्पदी-आत्मानुभूतिकहाँ कब-कब हुआ पैदा, कहाँ कब-कब रहा डेरा?कौन जाने कहाँ कब-कब, किया कितने दिन बसेरा?है सुबह उठ हुआ पैदा, रात हर सोया गया मर-कौन जाने कल्प कितने लगेगा अनवरत फेरा?साथ पाया, स्नेह पाया, सत्य बडभागी हुआ हूँ. व्यर्थ क्यों वैराग लूं मैं, आप अनुरागी हुआ ह...
ऋता शेखर 'मधु'
120
अपने गम को खुद सहो, खुशियाँ देना बाँटअर्पित करते फूल जब, कंटक देते छाँटये मिजाज़ है वक़्त का, गहरे इसके काजराजा रंक फ़कीर सब, किस विधि जाने राजदुख सुख की हर भावना, खो दे जब आकारवो मनुष्य ही संत है, रहे जो निर्विकारदरिया हो जब दर्द का, रह रह भरते नैनहल्की सी इक ठेस भी,...
ऋता शेखर 'मधु'
120
तोटक छंद (वर्णवृत छंद)वर्णिक मापनी - 112 112 112 112 मनु के मन में जब आस रहीहर बात तभी कुछ खास रहीउर में बहती नित प्रेम सुधाजग में हर भोर प्रभास रहीप्रिय है जिनका ब्रजधाम सखीमन में रहते वह श्याम सखीमुरली धुन से हरसी यमुना जपती रहती नित नाम सखीपथ के सब भीषण घात कहोम...
रविशंकर श्रीवास्तव
4
..............................
ऋता शेखर 'मधु'
120
1.2121/ 2121/ 2121/ 212आन बान शान से जवान तुम बढ़े चलोविघ्न से डरो नहीं हिमाद्रि पर चढ़े चलोवीर तुम तिरंग के हजार गीत गा सकोशानदार जीत के प्रसंग यूँ गढ़े चलो 2.2212/ 2212/ 2212/ 2212सरगम हवाओं की मुहब्बत से भरी सुन लो जरामहकी फ़िजा से फूल की तासीर को गुन लो जर...
ऋता शेखर 'मधु'
120
१.श्रम में लगे थे हाथ, भूख लगी हुए साथ, रोटियों को मिल बाँट, संग संग खा रहे|जो चतुर चालाक हैं, इरादों से ना पाक हैं, टुकड़ों को चुपचाप, तली में छुपा रहे|तन मन की थकन, क्षुधा की बढी़ अगन, लालच की आहुति में, सबको जला रहे|सद्भावना खिली रही, भावना बहती रही, मिट गए भाव...
ऋता शेखर 'मधु'
120
मनहरण घनाक्षरी...पत्र विहीन पेड़ की उजड़ी हुई डाल कोदया भाव से कभी भी मन में न आँकिएयहीं पर के नीड़ में अवतरित पंख हैंउड़ रहे परिंदों में किरन भी टाँकिएइसने भी तो जिया है हरे पात फूल फलआज अस्त मौन बीच चुपके से झाँकियेफिर बसंत आएगा किसलय भी फूटेंगेपतझर में भले ही रेत सू...
sanjiv verma salil
7
मुक्तक:गीता पंडित-संजीव 'सलिल' . घुटी-घुटी सी श्वासों में, आस-किरण है शेष अभी उठ जा, चलना मीलों है, थक ना जाना देख अभीमकड़ी फिर-फिर कोशिश कर, बुन ही लेती जाल सदा-गिर-उठ-बढ़कर तुझको है, मंज़िल पाना शेष अभी .  http://divyanarmada....
ऋता शेखर 'मधु'
120
१.आइने को पोंछ दूँ या खुद को सँवार लूँवक्त के धुँधलके में मैं रब को पुकार लूँहे प्रभु निखार दो मेरे अंतस का दर्पणतुम्हारा दिव्य रूप मैं उसमे निहार लूँ|............ऋता शेखर 'मधु'२.मिलेगा सम्मान देख लेना |मिलेगी मुस्कान देख लेना |हौसलों में होती है उड़ान,ऊँचा आसमान द...
 पोस्ट लेवल : चतुष्पदी