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Shachinder Arya
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इन दीवारों के बीच रहते-रहते वह इतना बड़ा हो गया कि घर में होता तो कभी बाहर निकलने के एहसास से नहीं भर पाता। वह चुप रहकर इन दीवारों को सुनने की कोशिश करता। तब उसे एक धुन सुनाई देती। धीमे-धीमे। आहिस्ता-आहिस्ता। जिधर से वह आवाज़ आती, वह उस तरफ़ अपनी थाली घुमा लेता। प्या...
Shachinder Arya
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कल रात इस ख़याल के दिल में उतरते जाने की देर थी कि नींद फ़िर लौट के नहीं आई। उस दृश्य को अपने सामने घटित होते देखता हूँ तो रौंगटे खड़े हो जाते हैं। रात ऐसे ही कई बार गिरफ़्त में ले लेती है। फ़िर छोड़े नहीं छोड़ती। गुप्ता जी वहीं कहीं सड़क किनारे ख़ून से लथपथ पड़े रह गए हों...
Shachinder Arya
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रात अभी शुरू हुई है। मन में न जाने कितनी बातें एक-दूसरे को धकेलते हुए मरी जा रही हैं। कोई भी किसी का इंतज़ार नहीं करना चाहती। बस एकबारगी कह दूँ तो उन्हे चैन पड़े। पर उन्हें एकसाथ यहाँ कहूँगा तो कोई मतलब भी बन पड़े, कह नहीं सकता। इसलिए तरतीब होनी चाहिए। एक सलीका सबको स...
Shachinder Arya
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वह रोज़ रात आधा पहर बीत जाने के आस-पास पसीने से तरबतर कपड़ों में ख़ुद को ढोते हुए लौट आते। लौटना कमीज़ को वापस घर लाने की तरह होता। वह कोई चित्रकार नहीं थे। पर उनके इस कैनवस पर रोज़ अलग-अलग तरह की चित्रकारी होती। कभी बनियान में अरझी सूखी घास का तिनका किसी किले की सबसे ऊ...
Shachinder Arya
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क्या लिख दूँ ऐसा कि कभी फ़िर लिखने की ज़रूरत ही न पड़े। बड़े मन से कमरे में दाख़िल हुआ था के आहिस्ते-आहिस्ते मन की परतों को उधेड़ता, कुछ नीचे दब गयी यादों को कह जाऊंगा। कहना क्या इतना आसान होता है हरबार। जो मन में आया, कह दिया? पता नहीं। शायद कभी.. कुछ नहीं। इसबार दो मही...
Shachinder Arya
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बड़े दिनों बाद आज अपने बारे में सोचता रहा। सोचता तो हमेशा रहता हूँ। पर आज लिखने के लिए थोड़ा अलग तरह से अंदर की तरफ़ लौटने लगा। जून की तपती दुपहरे कहीं जाने नहीं देतीं। फ़िर भी दोबार निकल गया। हम लोग घंटों वहीं आर्ट्स फैकल्टी की अँग्रेजी मेहराबों के बीच में पुराने दिनो...
Shachinder Arya
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मुझे कहीं-न-कहीं ऐसा ही लगा था, जैसा आपने बताया। आप बाद में यहाँ से बंबई गए होंगे। मैं तसवीरों में अपनी ज़िंदगी में छूट गए रंगों को ढूंढता रहा हूँ। मेरे यहाँ भी रंग हैं पर सब मिलकर काले में तब्दील हो गए हैं। मुझे लगता रहा है अभी मेरी ज़िंदगी मेरे मन की नहीं है, इसलिए...
Shachinder Arya
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सब कुछ वैसा ही है, जैसा कभी नहीं सोचा था। इस पंक्ति के बाद एकदम से सुन्न हो गया। आगे क्या कहूँ? कुछ कहने के लिए हैं भी या ऐसे ही दोहराव में हम अपने बिगड़ने को देखते रहते हैं। कई सारी बातें हैं, जिन्हे कहना है पर समेटने का सलीका थोड़ा भूलता गया हूँ। अभी खिड़की के बाहर...
Shachinder Arya
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ऐसी रात फ़िर कभी न आए। पूरी रात मम्मी के बाएँ पैर में दर्द इतना असहनीय बना रहा कि एक पल के लिए भी कहीं सुकून नहीं मिला। पैर फैला लेना तो दूर की बात है। रह रहकर उस अँधेरे कमरे में रोने को हो आता। कि मम्मी का पैर सवा नौ बजे के बाद ऐसा होता रहा। ग्यारह बजे बिजली की तरह...
Shachinder Arya
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वहाँ उस लोहे के दरवाज़े के पीछे उनकी दुनिया थी। इस बड़ी सी दुनिया में एक छोटा सा पता। बड़े लड़के की शादी अभी हुई थी इसलिए घर थोड़ा और छोटा हो गया थी। उनके इस एक कमरे वाले घर के बीचोबीच एक दरी बिछी हुई थी। जब कभी किसी मेहमान के आने की आहट होती, वे लोग कोई धुली सी साफ़ सी...