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sanjiv verma salil
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बुंदेली छंद:सड़गोड़ासनीशुभ प्रभात*सूरज नील गगन से झाँकशुभ-प्रभात कहता है।*उषा-माथ सिंदूरी सूरजदिप्-दिप्-दिप् दहता है।*धूप खेलती आँखमिचौली,पवन हुलस बहता है।*चूँ-चूँ चहक रही गौरैया,आँगन सुख गहता है।*नयनों से नयनों की बतियाँ,बज कंगन तहता है।*नदी-तलैया देख सूखतीघाट विर...
sanjiv verma salil
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एक बहर दो ग़ज़लें बहर - २१२२ २१२२ २१२ छन्द- महापौराणिक जातीय, पीयूषवर्ष छंद * १. महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश * बस दिखावे की तुम्हारी प्रीत है ये भला कोई वफ़ा की रीत है * साथ बस दो चार पल का है यहाँ फिर जुदा हो जाए मन का मीत है * ज़िंदगी की असलियत है सिर्फ़ ये चार दिन में...
sanjiv verma salil
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ॐ छंद सलिला: सवाई /समान छंद संजीव * छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १६-१६, पदांत गुरु लघु लघु । लक्षण छंद: हर चरण समान रख सवाई / झूम झूमकर रहा मोह मन गुरु लघु लघु ले पदांत, यति / सोलह सोलह रख, मस्त मगन उदाहरण: १. राय प्रवीण सुनारी व...
sanjiv verma salil
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ॐ छंद सलिला: त्रिभंगी छंद संजीव * छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १०-८-८-६, पदांत गुरु, चौकल में पयोधर (लघु गुरु लघु / जगण) निषेध। लक्षण छंद: रच छंद त्रिभंगी / रस अनुषंगी / जन-मन संगी / कलम सदा दस आठ आठ छह / यति गति मति सह / गुरु पदांत...
sanjiv verma salil
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छंदों का सम्पूर्ण विद्यालय हैं आचार्य संजीव वर्मा "'सलिल'आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' से मेरा परिचय पिछले चार वर्षों से है। लगभग चार वर्ष पहले की बात है, मैं एक छंद के विषय मे जानकारी चाहती थी पर यह जानकारी कहाँ से मिल सकती है यह मुझे पता नहीं था, सो जो हम आमतौर पर कर...
sanjiv verma salil
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सड़गोड़ासनी:बुंदेली छंद, विधान: मुखड़ा १५-१६, ४ मात्रा पश्चात् गुरु लघु अनिवार्य,अंतरा १६-१२, मुखड़ा-अन्तरा सम तुकांत .*जन्म हुआ किस पल? यह सोचमरण हुआ कब जानो?*जब-जब सत्य प्रतीति हुई तबकह-कह नित्य बखानो.*जब-जब सच ओझल हो प्यारे!निज करनी अनुमानो.*चलो सत्य की डगर पकड़ तोमी...
Yashoda Agrawal
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बड़ी कमबख्त दुनिया है।बड़ी बदबख्त दुनिया है।न पिघले आँख के बादल,बड़ी ही सख्त दुनिया है।सुनेगी दर्द क्या तेरा,यहाँ तो व्यस्त दुनिया है।चीखों पर भी है हँसती,बड़ी ही मस्त दुनिया है।सुबह भी छुप कहीं सोयी,यहाँ तो अस्त दुनिया है।सभी शापित सभी दानव,यहाँ अभिशप्त दुनिया है।खुशी...
 पोस्ट लेवल : रजनीश "स्वच्छंद"
sanjiv verma salil
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शारद वंदनाछंद - हरिगीतिकामापनी - लघु लघु गुरु लघु गुरु*कर शारदे! इतनी कृपा, नित छंद का, नव ग्यान देरस-भाव का, लय-ताल का, सुर-तान का, अनुमान देसपने पले, शुभ मति मिले, गति-यति सधे, मुसकान देविपदा मिटे, कलियाँ खिलें, खुशियाँ मिलें, नव गान दे*संजीव६-६-२०२०http://divyan...
sanjiv verma salil
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शारद वंदनापद(यौगिक जातीय सार छंद)*शारद सुर-ध्वनि कंठ सजावै।स्वर व्यंजन अक्षर लिपि भाषा,  पल-पल माई सिखावै।।कलकल कलरव लोरी भगतें, भजन आरती गावै।कजरी बम्बुलिया चौकड़िया, आल्हा राई सुनावै।।सोहर बन्ना बन्नी गारी, रास बधावा भावै।सुख में दुख में संबल बन कें, अँगुरी...
sanjiv verma salil
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शारद वंदनापौराणिक जातीय शारदा छंदविधान : न न म ज गयति : ८ - १०*नित पुलक करें दीदार शारदा!हँस अभय करो दो प्यार शारदा!*विधि हरि हर को जन्मा सुपूज्य होकर जन जन का उद्धार शारदा!*कण-कण प्रगटाया भाव-सृष्टि कीलय गति यति गूँजा नाद शारदा!*सुर-सरगम है आवास देवि कामम मन बस जा...