ब्लॉगसेतु

Basudeo Agarwal
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मन मोहा, तन कुसुम सम तेरा।हर लीन्हा, यह भ्रमर मन मेरा।।अब तो ये, रह रह छटपटाये।कब तृष्णा, परिमल चख बुझाये।।मृदु हाँसी, जिमि कलियन खिली है।घुँघराली, लट-छवि झिलमिली है।।मधु श्वासें, मलय-महक लिये है।कटि बांकी, अनल-दहक लिये है।।मतवाली, शशि वदन यह गोरी।मृगनैनी, चपल चकित...
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ब्रह्म लोक वासिनी।दिव्य आभ भासिनी।।वेद वीण धारिणी।हंस पे विहारिणी।।शुभ्र वस्त्र आवृता।पद्म पे विराजिता।।दीप्त माँ सरस्वती।नित्य तू प्रभावती।।छंद ताल हीन मैं।भ्रांति के अधीन मैं।।मन्द बुद्धि को हरो।काव्य की प्रभा भरो।।छंद-बद्ध साधना।काव्य की उपासना।मैं सदैव ही करूँ।...
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तु मात प्यारी।महा दुलारी।।ममत्व पाऊँ।तुझे रिझाऊँ।।गले लगाऊँ।सदा मनाऊँ।।करूँ तुझे माँ।प्रणाम मैं माँ।।तु ही सवेरा।हरे अँधेरा।।बिना तिहारे।कहाँ सहारे।।दुलार देती।बला तु लेती।।सनेह दाता।नमामि माता।।===========लक्षण छंद:-"जगाग" राचो।'यशोदा' पाओ।।121+ गुरु+ गुरु =5 वर्ण...
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जग-ज्वाला से दग्ध, पथिक इक था अति व्याकुल।झूठे रिश्ते नातों के, प्रति भी शंकाकुल।।मोह-बन्ध सब त्याग, शांति की चला खोज में।जग झूठा जंजाल, भाव ये मन-सरोज में।1।नश्वर यह मानव-तन, लख वैराग्य हुआ था।क्षणभंगुरता पर जग की, नैराश्य हुआ था।।उसका मन जग-ज्वाल, सदा रहती झुलसात...
Basudeo Agarwal
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रोला चार चरणों का, प्रत्येक चरण में 24 मात्रा का छंद है। चरणान्त गुरु अथवा 2 लघु से होना आवश्यक है। तुक दो दो चरण में होती है।कुंडलियाँ छंद के कारण रोला बहु प्रचलित छंद है। कुंडलियाँ में प्रथम दो पंक्ति दोहा की तथा अंतिम चार पंक्ति रोला की होती है। दोहा का चौथा चरण...
Basudeo Agarwal
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राम की महिमा निराली, राख मन में ठान।अन्य रस का स्वाद फीका, भक्ति रस की खान।जागती यदि भक्ति मन में, कृपा बरसी जान।नाम साँचो राम को है, लो हृदय में मान।।राम को भज मन निरन्तर, भक्ति मन में राख।इष्ट पे रख पूर्ण आश्रय, मत बढ़ाओ शाख।शांत करके मन-भ्रमर को, एक का कर जाप।राम...
Basudeo Agarwal
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हाथों में थी, मात पिता के, सांकलियाँ।घोर घटा में, कड़क रही थी, दामिनियाँ।हाथ हाथ को, भी ना सूझे, तम गहरा।दरवाजों पर, लटके ताले, था पहरा।।यमुना मैया, भी ऐसे में, उफन पड़ी।विपदाओं की, एक साथ में, घोर घड़ी।मास भाद्रपद, कृष्ण पक्ष की, तिथि अठिया।कारा-गृह में, जन्म लिया था...
Basudeo Agarwal
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भूधर बिखरें धरती पर हर ओर हैं।लुप्त गगन में ही कुछ के तो छोर हैं।।हैं तुषार मंडित जिनके न्यारे शिखर।धवल पाग भू ने ज्यों धारी शीश पर।।एक सरित इन शैल खंड से बह चली।बर्फ विनिर्मित तन की थी वह चुलबली।।ले अथाह जल अरु उमंग मन में बड़ी।बलखाती इठलाती नदी निकल पड़ी।।बाधाओं को...
sanjiv verma salil
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                                                                  ॐ       ...
 पोस्ट लेवल : भाषा छंद काव्य लेख
sanjiv verma salil
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छंद परिचय : १ चौदह वर्णिक अठारह मात्रिक छंद पहचानें इस छंद को, क्या लक्षण?, क्या नाम?रच पायें तो रचें भी, मिले प्रशंसा-नाम..*नमन उषानाथ! मुँह मत मोड़ना.ईश! कर अनाथ, कर मत छोड़ना.साथ हो तुम यदि, यम सँग भी लड़ें.कर-उठा लें नभ, जमा भू म...