ब्लॉगसेतु

sanjiv verma salil
0
 छंद सप्तक १. *शुभगति कुछ तो कहो चुप मत रहो करवट बदल- दुःख मत सहो *छवि बन मनु महान कर नित्य दान तू हो न हीन- निज यश बखान*गंग मत भूल जाना वादा निभानासीकर बहाना गंगा नहाना *दोहा:उषा गाल पर मल रहा, सूर्य विहँस सिंदूर।कहे न तुझसे अधिक है, सुंदर कोई हूर।।*सोरठासलिल...
sanjiv verma salil
0
ॐ हिंदी के मात्रिक छंद : १ ८ मात्रा के वासव जातीय छंद : अखंड, छवि/मधुभार संजीव *विश्व वाणी हिंदी का छांदस कोश अप्रतिम, अनन्य और असीम है। संस्कृत से विरासत में मिले छंदों के साथ-साथ अंग्रेजी, जापानी आदि विदेशी भाषाओँ तथा पंजाबी, मराठी, बृज, अवधी...
Yashoda Agrawal
0
हाँ भूल चुकी हूँ तुम्हेंपूरी तरह सेवैसे हीजैसे भूल जाया करते हैं बारहखड़ीतेरह का पहाड़ाजैसे पहली गुल्लक फूटने पर रोनाफिर मुस्कानाघुटनों पर आई पहली रगड़गालों पे पहली लाली का आनातितली के पंखों की हथेली पर छुअनटिफिन के पराठों का अचार रसा स्वादवो पहली पहल शर्माना..पर जाने...
Shachinder Arya
0
इधर सोचने बहुत लगा हूँ। पुराने दिनों पर घंटों सोचते हुए हफ़्तों बिता सकता हूँ। इतने दिन बिता देने की यह काबिलियत मुझमें अचानक घर नहीं कर गयी। यह मेरे ख़ून में है। क्योंकि मेरे ख़ून में इस मिट्टी की हवा नहीं है। पानी भी नहीं है। कुछ भी नहीं है। जिस-जिस के ख़ून में यहाँ...
sahitya shilpi
0
..............................
 पोस्ट लेवल : डॉ छवि निगम कविता
राजीव कुमार झा
0
फिर से खिले टेसूफिर से महकीमन की गलियांप्यार की गंध लिएआँचल मेंसजा बंदनवार मन का अनुराग सभी दृष्टि में निचुड़ गया सतरंगी सपनों का सागर उमड़ गया बिखर गई अंतस तक केसरिया चांदनी नीलकंवल छवि हुई हंसी के संतूर बजे शब्द-शब्द झरे जैसे मदिरा मधुर अंगूर उगे
 पोस्ट लेवल : टेसू मन छवि अनुराग
Shachinder Arya
0
अकेले खाली कमरे में बैठे रहने का सुख  क्या होता है, इसे भरे हुए लोग कभी नहीं जान पाएंगे। उनकी उन दिवारों पर घूमती छिपकलियों से कभी बात नहीं होगी। वे कभी अकेले नहीं होना चाहेंगे। वे कभी छत से झड़ते पलस्तर को ‘स्लो मोशन’ में देख लेने वाली आँखों वाले नहीं हो सकते।...
Shachinder Arya
0
न लिखना पाना किसी याद में रुक जाना है। इसे टाल देना, उसमें ही कहीं छिप जाना है। लगता है, इधर ऐसे ही छिप गया हूँ। यहाँ न आने के पीछे कई गैर-ज़रूरी बातें रही होंगी। पर उनका होना कतई इसलिए गैर-ज़रूरी नहीं रहा होगा। उनकी कलई खुलते-खुलते देर लगती है, पर पता लग जाता है। इस...
Shachinder Arya
0
उस इमारत का रंग लाल है। अंग्रेजों के जमाने की। अभी भी है। ख़स्ताहाल नहीं हुई है। उसकी देखरेख करने वाले हैं। किसी लॉर्ड ने इसका शिलान्यास किया होगा। आज़ादी से पहले। कई बार उसे पत्थर को पढ़ा है, पर अभी याद नहीं है। यहाँ ख़ूब बड़े-बड़े कमरे हैं। जीने भी शानदार सीढ़ियों के सा...
Shachinder Arya
0
बात तब की है जब फोटो खींचने वाले कैमरों से दोरंगी तस्वीरें ही निकला करती थी। हम तब पैदा भी नहीं हुए होंगे। पर अपने छुटपन से हम लकड़ी वाली अलमारी खोलते और बड़े आहिस्ते से एक एककर सारे एलबम निकाल लेते। धीरे-धीरे उन पुरानी यादों से अपनी पहचान बनाते। तब से लेकर आज तक...