ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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पता नहीं कभी-कभी क्या होता है, हम चाहकर भी नहीं समझ पाते। शायद तभी उन बीत गए दिनों में लौट कर उन्हें दुरुस्त करने की ज़िद से भर जाते होंगे। अगर ऐसा न होता तब मुझे भी हलफ़नामे की तरह दोबारा उन बातों पर गौर करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। सोचता हूँ, अगर मेरे मन में वह ख़याल दो...
Shachinder Arya
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यह तस्वीर जिस वक़्त की है, तब घड़ी पाँच बजकर बाईस मिनट पर स्थिर है और मदन कश्यप अपनी कविता ‘ढपोरशंख’ सुना रहे हैं। मुझे भी आए हुए काफ़ी देर हो चुकी है। शायद एक डेढ़ घंटे से खड़ा हूँ। खड़े-खड़े कमर में दर्द जैसा था, पर लौटने का मन नहीं था। देवेश से पहले समर मुझे वहीं एक कं...
Shachinder Arya
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गुरु: पुनीत जी आपकी इस किताब पर मैंने जनसत्ता में लिखा था। वह भी खरीद कर। इस पर लिखी गई बेहद कम समीक्षाओं में एक वह भी। लेकिन हम जैसे हिंदी के मामूली लेखक आपको याद नहीं रहते। हिंदी के लेखक में ग्लैमर नहीं होता न। लेकिन दुर्भाग्य से आप भी उसी ग्लैमरहीन भाषा के लेखक...
Shachinder Arya
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बात पता नहीं किस दिन की है। होगी किसी दिन की। हम लोग फरवरी की ठंड में सिकुड़ते हुए नेहरू प्लेस से शायद नजफ़गढ़ जाने वाली बस में बैठे थे। ग्रेजुएशन का आख़िरी साल था। हम जेएनयू फ़ॉर्म भरने जा रहे थे। वह हमारे नए सपने का नाम था। जिस बस में हम थे, उसकी पिछली सीटें भी बस की...
Shachinder Arya
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खिड़कियों पर पर्दे डालकर इस लाल अँधेरे में बैठे बहुत देर से सोच रहा हूँ। कई सारी बातें चलकर थक चुकी हैं। कुछ मेरे बगल ही बैठी हैं। कुछ सामने एक बंद किताब की ज़िल्द के अंदर छिपी हुई हैं। डायरी लिखना एक दम बंद होने की कगार पर है। लिखने का मन होते हुए भी पूरे दिन की भाग...
Shachinder Arya
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अचानक वापस लौटता हूँ उस सीन पर जहाँ सबकुछ ठहर चुका था। वहाँ थोड़ी देर में आसमान से कोई बर्फ नहीं गिरने वाली थी। न हम दोनों अचानक बाहों में आकर एक दूसरे को भूलने वाले थे। कितना भी चाहता, मेरे कमज़ोर से हाथ तुम्हारी कलाई पकड़े उस बड़े से गेट से बाहर निकल जाने की कोशिश क...
Shachinder Arya
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वह कभी अकेले निकल जाता और किसी पेड़ के नीचे बैठ दिमाग में घूमती हरबात को सुनने की कोशिश करता। आज शाम अँधेरे के साथ बरसात में सड़कें गीली थीं। उसके मन के भीतर वह किसी पल फिसल गया। इतने सालों में उसने कभी ध्यान से नहीं सोचा लगातार उस चारदीवारी में उसकी बातों की जगह सिम...
Shachinder Arya
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कभी-कभी हम वहाँ होना चाहते हैं, जहाँ हम नहीं होते। जैसे इधर। इन दिनों। कहीं फँस गया हूँ। निकल नहीं सकता, ऐसा नहीं है। पर ऐसा ही है। निकल नहीं सकता। यह ऐसी स्थिति है, जिसे जितना समझता हूँ, उतनी ही उलझती जाती है। उलझना किसी पतंग के साथ नहीं। उन उँगलियों में स्वेटर बु...
Shachinder Arya
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अँधेरा जल्दी होने लगा है। ठंड इतनी नहीं है। धीरे-धीरे बहुत सी तरहों से सोचने लगा हूँ। कई बातें लगातार चलती रहती हैं। पीछे लगतार अपने लिखने पर सोचता रहा। एक बार, दो बार, तीन बार । पर कहीं भी पहुँच न सका। ख़ुद की बुनावट में कई चीज़ें इस तरह गुंफित हैं कि वह इतना आसान ल...
Shachinder Arya
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थोड़ी देर झूठ बोलना चाहता हूँ। कहीं से भी कोई आवाज़ सुनाई न दे। सब चुपचाप सुनते रहें। कहीं से छिपकर मेरी आवाज़, उनके कान तक आती रहे। उन्हे दिखूँ नहीं। बस ऐसे ही छिपा रहूँ। पता नहीं यह कितनी रात पुरानी रुकी हुई पंक्ति है। इसे लिखना चाहता था, ‘रोक दी है’। जैसे, इतने दिन...