ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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लिखना छोड़ा नहीं है। नया घर सजाया है। मन तो नहीं था पर क्या करूँ, यहाँ भी बता रहा हूँ। एकएक कर बताने से अच्छा तरीका यही लगा। आप सबको नया पता बताता चलूँ। जो लोग मेरे यहाँ से जाने के बाद से नाराज़ हैं, उनका हमारा साथ और आगे तक जाये, यही मन में दिल में दिमाग में है। करन...
Shachinder Arya
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मैं लिखना चाहता हूँ वह शब्द, जो आज से पहले कभी किसी ने नहीं लिखे हों। वह एहसास जो किसी ने न महसूस किए हों। कहीं से भी ढूँढ़ना पड़े, उन्हे खोजकर ले आऊँगा। उन्हें ढूँढ़ने में कितना भी वक़्त बीत जाए, पर वह मिल जाएँ, एकबार। कभी मन करता है, बस ऐसे ही उनकी तरह गुम होते रहना...
Shachinder Arya
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मैं कभी कुछ नहीं बोलूँगा, बस चुप रहूँगा। आप जब कुछ कहेंगे, तब मैं कुछ नहीं कहूँगा। आप देखने को कहेंगे, मैं बिलकुल नहीं देखुंगा। आपकी सहजता को असहजता में नहीं बदलने दूँगा। आप सहज रहें इसलिए खुद ही असहज होता रहूँगा। कुछ बोलने से पहले कुछ नहीं बोलूँगा। आपके लिए अपना...
Shachinder Arya
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शहरों में जो लोग अपने सपनों के साथ दाखिल होते हैं, कभी कोई उनसे उनके सपनों के बारे में नहीं पूछता। उन्हे कहीं कोई ऐसा भी नहीं मिलता, जो उन अधूरे सपनों को किसी किताब में लिखकर, किसी जगह कतरन बनाकर लिख अपने पास रख ले। कभी कोई होता, जो उस किताब को पढ़कर अपने जैसे सपने...
Shachinder Arya
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वह पुल एक शांत पुल था। किसी नदी के ऊपर नहीं। दो इमारतों के बीच हवा में टंगा हुआ-सा। वह हमारे बचपन से पता नहीं कितने सारे तंतुओं को जोड़ता एक दिन गायब होता गया। उसका अस्तित्व हमारे लिए उतना ही ज़रूरी बनता गया जितना की हमारे फेफड़ों में भरती जाती हवा। उसका चले जाना उन ध...
Shachinder Arya
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तबीयत अब ठीक है। वो जैसे ही मौसम बदलता है, सबसे पहले मुझमे दिखने लगता है। हम कभी कुतुब के बाहर बची रह गयी जगहों पर नहीं जा पाये। जमाली-कमाली भी उनमें से एक है और भी पता नहीं ऐसे कितनी जगहें होंगी कहाँ-कहाँ। फ़िर दिल्ली का यह मौसम तो माशा अल्लाह। इधर अप्रैल पिछली बार...
Shachinder Arya
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आज शायद इस कमरे में आखिरी रात होगी। इसतरह अभी सुबह इस कमरे में लिखी जा रही यह आख़िरी पोस्ट। छूटना सिर्फ़ बिन हड्डी वाले नरम दो हाथों का नहीं होता। कमरे भी छूटा करते हैं। यह स्थापत्य कला का कोई बेजोड़ नमूना नहीं है, हमारी न जाने कितनी ‘यादों का घर’ है। इसे एक दिन ऐसे ह...
Shachinder Arya
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एक छोटीसी झोपड़ी थी। उन सबने मिलकर उसका नाम झोपड़ी ही रखा था। शहर और सड़क कही जाने वाली संरचनाओं से बहुत दूर। हमारी परछाईं से भी बहुत दूर। कहीं दिखाई न देने वाली जगह के पास। वहाँ तक जाने वाले रास्ते को वह कितना भी याद करतीं, वह कभी याद नहीं रहता। यह भूल जाने के बाद या...
Shachinder Arya
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सड़क किनारे कहीं दिवाल नहीं थी, इसलिए पेड़ ही दीवार है। बसों का घंटाघर। यह ढाबली, पैट्रोल पंप है। जब वह आ जाएगा, यह गुम हो जाएगी। 
Shachinder Arya
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इसे ढाबली कहते हैं, पर अभी बंद है। एक अरुण की भी है, पान की। वह बंद है, वह खुली है। जो ट्रॉली के बिलकुल पीछे खुली है,  वही बिसातखाना है। इसकी कहानी फ़िर कभी।