ब्लॉगसेतु

ज्योति  देहलीवाल
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भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद अक्सर लोग यह कहते सुने जा सकते हैं कि एक वोट से क्या होगा। हमारे देश में वोट देने के दिन लोगों को जरूरी काम याद आने लग जाते हैं। कई लोग तो वोट देने के दिन अवकाश का फायदा उठाकर परिवार के साथ पिकनिक मनाने चले जात...
ज्योति  देहलीवाल
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हम अक्सर जरा सी मुश्किलों से ही हिम्मत हार जाते हैं। मुश्किलों से लड़ने की बजाय ईश्वर को और अपने आप को कोसने लगते हैं। हम अक्सर ये वाक्य दोहराते हैं कि यदि मेरे साथ ऐसा नहीं होता तो मैं ज़रुर ऐसा करती/करता...। लेकिन दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके शब्दकोश में ऐस...
सरिता  भाटिया
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याद है मुझे वो लम्हा जब वो बढ़ चला था जिंदगी की पगडंडियों पर पाने को अपना अंतिम लक्ष्य मैं देख रही थी सुनहरे सपनेउसके साथ जीने के मकसद तो एक ही था जीवन से मृत्यु का मिलन लेकिनवो बहुत आगे निकल गयामुझसे बिछुड़कर यही था मिलन &nbsp...
 पोस्ट लेवल : जज्बात यश जीत हार
Madabhushi Rangraj  Iyengar
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अपना जहाँ. ये दौलत ,ये शान, ये बंगला , ये कार, नहीं है चाह जहाँ में कुछ भी मिले मुझे, बस एक कसक सी रही जिंदगी में हरदम ही,  तुम्हारा प्यार जहाँ में मुझे मिले न मिले. न जाने कितने जज्बात लिए, दिल में हमेशा फिरती हो, नयन तो कहते ही जाते हैं, जु...
सरिता  भाटिया
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तुम पूछते थे हर पल,बताते थे हर पल उस पल में खुश थी पूछते नहीं तुम अब ,बताते नहीं तुम अब इस पल में भी खुश हूँ |सिलसिले थे बातों के प्यार के जज्बातों के उस पल में खुश थी ख़त्म हुए सिलसिले आ गये शिकवे गिले इस पल में भी खुश हूँ |म...
 पोस्ट लेवल : खुशी सिलसिला जज्बात पल
सुशील बाकलीवाल
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गाडी-बंगला व साधन-संम्पन्न श्रीमंतों की पहुँच से दूर...जोशे जिंदगानी(2)और अब इनसे भी मिल लीजिये...
ऋता शेखर 'मधु'
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आज हिन्दी हाइगा पर पधार रही हैं शशि पुरवार जी...छंद और ग़ज़ल पर आपकी अच्छी पकड़ है...और हाइकु...शानदार लिखती हैं...अवलोकन कीजिए...सारे चित्र गूगल से साभार
Rajendra kumar Singh
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जबकि मैं मौन हूँ,मौन रह कर क्याबता पाउँगा इस दुनियाँ कोमेरे दिल में भी कुछ जज्बात मचलते हैंदिलों से बर्फ पिघलते हैंमैं भी आशा रखता हूँ कीप्यार की कलियाँ महकेसदभावना की नदियाँ बहेमेघ के रह ताल परप्यार की बरसात होमैंने तो चाँद को भी देखा है हमेशाचकोर की नजर सेचकाचौंध...
pradeep beedawat
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(1)खिलना चाहता था कहीं सुदूर व्योम में,बनना चाहता था समिधा किसी होम में।धूप में भी तो कभी नहीं वो हंस पायाहवा ओ अंधेरे ने जो 'प्रदीप' बुझाया।।(2)थरथराता धुआंजब मां मेरी बेरोजगारी पर आंसू बहाया करती है,चुपके से अपनी ही ओढ़नी में आंखें छुपाकर।।तब इक तीली की तरह ही जलत...