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sanjiv verma salil
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सामयिक त्रिपदियाँ :संजीव 'सलिल'*खोज कहाँ उनकी कमर,कमरा ही आता नज़र,लेकिन हैं वे बेफिकर..*विस्मय होता देखकर.अमृतघट समझा जिसेविषमय है वह सियासत..*दुर्घटना में कै मरे?गैस रिसी भोपाल में-बतलाते हैं कैमरे..*एंडरसन को छोड़करकी गद्दारी देश सेनेताओं ने स्वार्थ वश..*भाग गया भ...
 पोस्ट लेवल : त्रिपदियाँ जनक छंद
sanjiv verma salil
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जनक छंद / त्रिपदियाँ  *ब्यूटी पार्लर में गयीवृद्धा बाहर निकलकरयुवा रूपसी लग रही..*नश्वर है यह देह रे!बता रहे जो भक्त कोरीझे भक्तिन-देह पे..*संत न करते परिश्रमभोग लगाते रात-दिनसर्वाधिक वे ही अधम..*गिद्ध भोज बारात मेंटूटो भूखें की तरहअब न मान-मनुहार है..*पि...
 पोस्ट लेवल : त्रिपदियाँ जनक छंद
Basudeo Agarwal
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करके सफल चुनाव को,माँग रही बदलाव को,आज व्यवस्था देश की।***बहुमत बड़ा प्रचंड है,सत्ता लगे अखंड है,अब जवाबदेही बढ़ी।****रूढ़िवादिता तोड़ के,स्वार्थ लिप्तता छोड़ के,काम करे सरकार यह।***राजनीति की स्वच्छता,सभी क्षेत्र में दक्षता,निश्चित अब तो दिख रही।***आसमान को छू रहा,रग र...
Basudeo Agarwal
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जनक छंद रच के मधुर,कविगण कहते कथ्य को,वक्र-उक्तिमय तथ्य को।***तेरह मात्रिक हर चरण,ज्यों दोहे के पद विषम,तीन चरण का बस 'जनक'।****पहला अरु दूजा चरण,समतुकांतता कर वरण,'पूर्व जनक' का रूप ले।***दूजा अरु तीजा चरण,ले तुकांतमय रूप जब,'उत्तर जनक' कहाय तब।***प्रथम और तीजा चर...
sanjiv verma salil
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जनक छंदी सलिला: २                                         &n...
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sanjiv verma salil
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जनक छंदी सलिला : १.संजीव 'सलिल'*आत्म दीप जलता रहे,तमस सभी हरता रहे.स्वप्न मधुर पलता रहे..*उगते सूरज को नमन,चतुर सदा करते रहे.दुनिया का यह ही चलन..* हित-साधन में हैं मगन,राष्ट्र-हितों को बेचकर.अद्भुत नेता की लगन..*सांसद लेते घूस हैं,लोकतन्त्र के खेत की.फसल खा र...
 पोस्ट लेवल : जनक छंद janak chhand
sanjiv verma salil
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समस्या पूर्ति कार्यशाला- ७-११-१७ आज का विषय- पथ का चुनाव अपनी प्रस्तुति टिप्पणी में दें।किसी भी विधा में रचना प्रस्तुत कर सकते हैं। रचना की विधा तथा रचना नियमों का उल्लेख करें। समुचित प्रतिक्रिया शालीनता तथा सन्दर्भ सहित दें।रचना पर प्राप्त सम्म...
sanjiv verma salil
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हाइकु:ईंट रेत का मंदिर मनहर देव लापताक्षणिका :*पुज परनारी संग श्री गणेश गोबर हुए. रूप - रूपए का खेल, पुजें परपुरुष साथ पर लांछित हुईं न लक्ष्मी***जनक छंद :नोबल आया हाथ जब उठा गर्व से माथ तब आँख खोलना शेष अबसोरठा :घटे रमा की चाह, चाह शारदा की बढ़े...
sanjiv verma salil
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अभिनव प्रयोग जनकछन्दी (त्रिपदिक) गीत *मेघ न बरसे राम रे! जन-मन तरसे साँवरे!कब आएँ घन श्याम रे!!*प्राण न ले ले घाम अबझुलस रहा है चाम अबजान बचाओ राम अब.मेघ हो गए बाँवरेआये नगरी-गाँव रे!कहीं न पायी ठाँव रे!!*गिरा दिया थक जल-कलशस्वागत करते जन हरषभीगे -डू...
sanjiv verma salil
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जनक छन्द सलिला*श्याम नाम जपिए 'सलिल'काम करें निष्काम हीमत कहिये किस्मत बदा *आराधा प्रति पल सततजब राधा ने श्याम कोबही भक्ति धारा प्रबल*श्याम-शरण पाता वहीजो भजता श्री राम भीदोनों हरि-अवतार हैं*श्याम न भजते पहनतेनित्य श्याम परिधान हीउनके मन भी श्याम हैं*काला कोट...