ब्लॉगसेतु

Bharat Tiwari
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तारीखी तस्वीर — मुकेश भारद्वाजआमार शोनार बांग्ला,आमि तोमाए भालोबाशी.(मेरा सोने जैसा बंगाल / मैं तुमसे प्यार करता हूं)...रवींद्रनाथ टैगोर ने 1905 में यह गीत लिखा था जब अंग्रेजों ने मजहब के आधार पर बंगाल के दो टुकड़े कर दिए थे। गुरुदेव का लिखा यह गीत उस बांग्लाद...
गौतम  राजरिशी
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(दैनिक जनसत्ता 04 सितम्बर 2016 में आई मेरी एक कहानी)      “क्या बतायें हम डॉक्टर साब, उसे एके-47 से इश्क़ हो गया और छोड़ कर चली गई हमको”, कहते-कहते माजीद की आँखें भर आई थीं | माजीद...माजीद अहमद वानी...उम्र करीब सैंतीस-अड़तीस के आस-पास, मुझसे बस कुछेक सा...
 पोस्ट लेवल : कहानी दैनिक जनसत्ता
Bharat Tiwari
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कब तक— वीणा शर्माअरस्तु का कहना है कि समस्या से भागना कायरता है, आत्महत्या भले ही मृत्यु के समक्ष बहादुरी है लेकिन इसका उद्देश्य गलत है। टायन्बी कहते हैं कि कोई भी संस्कृति आत्महत्या से मरती है, हत्या से नही। हर रोज समाचारों में कही न कही किसी की आत्महत्या की सूचना...
prabhat ranjan
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'जनसत्ता' में 17 सालों से प्रकाशित होने वाला स्तम्भ 'कभी कभार' बंद हो गया. इससे अधिक समय से जनसत्ता में सिर्फ 'देखी सुनी' स्तम्भ का ही प्रकाशन हुआ है. इस सन्दर्भ में श्री वाजपेयी ने जनसत्ता संपादक को एक पत्र लिखा है, जो हमारे सूत्र से हमें प्राप्त हुआ है. आप भी पढ़ि...
संतोष त्रिवेदी
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दीवाली सिर पर हैं पर घर की दीवारें वैसी ही गंदी नज़र आ रही हैं।कई ठेकेदारों से सम्पर्क किया लेकिन बजट ऐसा कि बूते के बाहर।अभी पाँच दिनों की ऑनलाइन शॉपिंग से उबरा नहीं था कि श्रीमती जी ने तीखा बयान जारी कर दिया-अबकी दीवाली में साफ़-सफ़ाई बहुत ज़रूरी है।पिछले तीन सालों स...
Shachinder Arya
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असहमतिअपूर्वानंद दिल्ली विश्वविद्यालय में हमारे मास्टर रहे हैं। हम आज भी उनसे काफ़ी कुछ सीखते हैं। हमने उनसे बात को तार्किक आधार से कहने का सहूर सीखा और लिखकर उसे कहने का कौशल भी। लेकिन वह एनडीटीवी के 'मुक़ाबला' में कैसी बात कह रहे हैं। समझ नहीं आता। वह जब अल्पसंख्यक...
Shachinder Arya
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अगस्त बाईस तारीख। दिल्ली में बारिश, बारिश कहने लायक भी नहीं हुई है। उमस कम है पर आसमान से बूँदें भी नहीं गिर रहीं। सब इंतज़ार में हैं। पेड़, बिरवे, मोर, चिरिया, पंछी, मिट्टी, घास, भूत परेत सब। महिना ख़त्म होने को है और करने के लिए कुछ नहीं है। ऐसा मन सोचता है, पर कई स...
संतोष त्रिवेदी
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 अंततः वे लालकिले में चढ़ाई करने में सफल हो गए।पिछली बार वाला लालकिला नकली था पर लोगों को दहाड़ असली सुनाई दी थी।उसी उम्मीद में इस बार कई लोग यह देखने बैठे थे कि नकली लालकिले से जो सीना छप्पन इंच फूल सकता है,असली लालकिला पाकर कहीं वह वह फूल कर कुप्पा न हो जाय ;प...
Shachinder Arya
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दिल्ली, मेरा शहर। बीते शनिवार से इस भाववाचक संज्ञा को कितनी ही बार अंदर-ही-अंदर दोहरा रहा हूँ, पता नहीं। कितनी ही यादें बेतरतीब हुई जा रही हैं। आगे पीछे। ऊपर नीचे। इसमें ऐसा कुछ है जो बैठने नहीं दे रहा। हर वक़्त लग रहा है कुछ छूट रहा है। कुछ पीछे रह गया है। शायद डीट...
संतोष त्रिवेदी
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बहुत ज़ोरदार लहर चल रही है। रास्ते में जो भी कूड़ा-करकट या उपयोगी-अनुपयोगी सामान मिल रहा है,वह सबको लपेट रही है। बड़े ही निर्विकार भाव की लहर है। अपने-पराये में कोई भेद नहीं कर रही है। सत्ता कितनी निर्मम और कितनी दयालु हो सकती है,यह लहर बता रही है। शिखर पर पहुँचने में...