जमाने की उलझनों में गीत नए गाए जाएंबसंत को बसंत समझ प्रीत नए लाए जाएंसेमलों का बाग हो या आम के बौर से नजदीकियाँहरे/भरे घास के पत्तों से भी धूल हटाए जाएंमोहब्बतों में आसमां ही हो ऊपर ये जरूरी नहींजमीन पर हों जो करीब उनपर प्रेम जताए जाएं-प्रभात