ब्लॉगसेतु

Yashoda Agrawal
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तेज धड़कनों का सचसमय के साथ बदल जाता हैकभी देखते हीया स्पर्श भर सेस्वमेव तेज रुधिर धारबता देती थीहृदय के अलिंद निलय के बीचलाल-श्वेत रक्त कोशिकाएं भीकरने लगती थी प्रेमालापवजह होती थीं 'तुम'इन दिनों उम्र के साथधड़कनों ने फिर सेशुरू की है तेज़ी दिखानीवजह बेशकदिल द मामला...
kuldeep thakur
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सादर अभिवादन..ज़िंदगी-----संसार में जन्म के साथ मिलने वाली धुकधुकाती साँसों से, जग से साँसों का नाता टूटने तक की यात्रा सृष्टि के प्रत्येक जीव की  ज़िंदगी है।जितने प्रकार का देह का आवरण, उतनी विविधता, "जितने जीव उतनी ज़िंदगी।"★हर उम्र में ज़िंद...
 पोस्ट लेवल : ज़िन्दगी 1515
Bhavana Lalwani
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 "क्योंकि, मैं तुम्हारा  लौह आवरण उतरते देख रहा हूँ। "'और तुम खुश हो रहे हो ?"" नहीं, लेकिन इतना अंदाज़ा नहीं लगाया था मैंने।""किस बात  का अंदाज़ा ?""तो क्या अंदाज़ा था तुम्हारा ?""जो भी था, जाने दो। ""मेरे ख्याल से एक एक कंकर  फेंकने के बजाय...
शेखर सुमन
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वक़्त बहुत गुज़र गया है इन सालों में, उतना ही जितना कायदे से गुज़र जाना चाहिए था.. ज़िन्दगी भी वैसे ही चल रही है जैसे मामूली तौर पर चला करती है... कोई चुटकुला सुना दे तो हंस देता हूँ और कोई इमोशनल मूवी दिखा दे तो आंसू निकल आते हैं... कुछ भी ऐसा बदला नहीं है, जिसका जिक्...
Dr. Priyanka Jain
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..."सपनों का वो पहले करिश्मा अब कहाँ स्थित है..किसी ने सोचा, किसी ने ढूँढ़ने का यत्न किया, किसी ने कोई रपट लिखवाई..सब यथावत हो गए..समय की नोक पर विश्वास का खेत भरपूर कनक देता है..धरा को एक क्षण पूज लेना, स्वतः ही अद्भुत संगम हो जाता है..खिलाड़ियों का निर्माण क्षेत्र...
 पोस्ट लेवल : ज़िन्दगी..
शेखर सुमन
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तुम प्यार करोगी न मुझसे,तब, जब मैं थक के उदास बैठ जाऊँगातब, जब दुनिया मुझपे हंस दिया करेगीतब, जब अँधेरा होगा हर तरफतब, जब हर शाम धुंधलके में भटकूँगा मैं उदासतब एक उम्मीद का दिया जगायेतुम प्यार करोगी न मुझसे...तब, जब मुझे दूर तक तन्हाई का रेगिस्तान दिखाई दे तब,...
शेखर सुमन
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बहुत धीमी बहती है मोहब्बत लोगों की रगों में,नफरत से कहीं धीमी...नफरत इतनी किसड़क पर अपनी गाड़ी कीहलकी सी खरोंच पर भीहो जाएँ मरने-मारने पर अमादा,और मोहब्बत इतनी भी नहीं किअपने माँ-बाप को लगा सकेंअपने सीने सेऔर कह सकें शुक्रिया...बहुत धीमी बहती है मोहब्बत लोगों की रगों...
शेखर सुमन
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कभी-कभी बैठे बैठे अचानक से हम दूर कहीं पीछे छूट चुकी याद के सिरे टटोल बैठते हैं... आज ऑफिस से वापस आते हुए कोई पुराना सा लम्हा आकर मेरी आखों के सामने पसर गया... इस खुशनुमा मौसम में अचानक से कसक सी उठी, तुमसे बात न कर पाने की कसक... मुझे नहीं पता कि ऐसा क्या है...
Yashoda Agrawal
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अक्स ने आईने का घर छोड़ाएक सौदा था जिसने सर छोड़ाभागते मंज़रों ने आंखों मेंज़िस्म को सिर्फ़ आंख भर छोड़ाहर तरफ़ रोशनी फैल गईसांप ने जब खंडहर छोड़ाधूल उड़ती है धूप बैठी हैओस ने आंसुओं का घर छोड़ाखिड़कियाँ पीटती है सर शब भरआखिरी फ़र्द ने भी घर छोड़ाक्या करोगा निज़ाम...
Yashoda Agrawal
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बूंदी पानी की हूं थोड़ी-सी हवा है मुझ मेंइस बिज़ाअत पे भी क्या तुर्फ़ां इना है मुझ मेंये जो इक हश्र शबो-रोज़ बपा है मुझ मेंहो न हो और भी कुछ मेरे सिवा है मुझ मेंसफ़्हे-दहर पे इक राज़ की तहरीर हूं मैंहर कोई पढ़ नहीं सकता जे लिखा है मुझ मेंकभी शबनम की लताफ़...