पथ पर आगे बढ़ते-बढ़ते, पाषाणों से प्यार हो गयाजीवन का दुख-दर्द हमारे, जीने का आधार हो गया--पत्थर का सम्मान करो तो, देवदिव्य वो बन जायेगापर्वतमालाओं में उपजा, धरती का अवतार हो गया--प्राण बिना तन होता सबका, केवल माटी का पुतला हैजीव आत्मा के आने से, श्वाँसों का संचार...