ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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वह लोग एक ऐसे समय में जी रहे थे, जहाँ इस शहर के अलावे कहीं किताब लिखने वाले नहीं बचे थे। जिसे आना था, जिसे छपना था, उसे इस राजधानी आना पड़ता। यह मजबूरी कम सुविधा अधिक थी। यह उन सबका संगठित प्रयास था, जो लेखकों को यहाँ अपने आप खींच लाता। कोई भी होता उसे पिताजी मार्ग...
Shachinder Arya
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वहीं हैं, जहाँ हम थे। यहीं अपनी दिल्ली में। कहीं गए नहीं हैं। जिसका अपना कोई मौसम नहीं। जिसकी जमा पूँजी अब सालभर गरमी ही रह गयी है। किसी काम लायक नहीं छोड़ती। अलसाए से दिन। उतनी ही बोझिल-सी रातें। बीच में शामें तपते सूरज से बचाती कम, उमस में लिपटे तौलिये जैसे निचोड़त...
Shachinder Arya
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पीछे से बाक़ी ..लिखने का मन कल रात था। पर लिख नहीं पाया। सो गया। थका था। अभी भी इतना ख़राब लिखकर नीचे से आया, तब से सोच रहा हूँ, ऐसा क्या है, जो उसमें कम है? वहाँ क्या कह दिया, जिसके लिए वहाँ जगह नहीं थी। पता है हम लोग हार रहे हैं। हारे हुए लोग हैं। कभी-कभी ख़ुद को बच...
Shachinder Arya
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जैसे अभी लिखने वाला हूँ कि मुझे नहीं पता के ‘रक़ीब’ का मतलब क्या है। पहली बार सुना। इतनी पास से। सोच रहा था इसके बाद रुक क्यों गया। लाया तो था के बहुत कुछ है, जो कह दूंगा। पर ठहर क्यों गया? कभी-कभी कुछ देर पहले तक मन होता है। फ़िर अचानक वहाँ से हट कहीं और चल जाता है।...
Shachinder Arya
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 1. मन रुका नहीं। थोड़ी देर में ही बाहर निकला। थोड़ा चल भी लेना चाहिए। शाम ढले दुनिया थोड़ा बदलती भी है। पूरे रास्ते सोचता रहा काफी कुछ रहने दिया या छूटता गया। उसे चाहकर भी कह न पाया। सब कुछ कहना वैसे भी कहाँ अभीष्ट है? कौन चाहता है सब कह दिया जाये। पर अभी बैठा ह...
Shachinder Arya
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सारे रंग उड़ गए हैं। सब सफ़ेद रंग बन गए हैं। बिन लकीर के। बिन किसी छाया के। किसी पेड़ में कोई हरियाली नहीं। किसी आसमान में कोई नीलापन नहीं। चाँद भी नीली रोशनी सा नहीं। या उन सभी को एक प्लेट में घोलकर अपने ‘ब्लॉग’ की दीवार पर चिपका लिया है। पता नहीं। पर सच में अभी वह क...
Shachinder Arya
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जबसे पिछली पोस्ट लिखी है नींद गायब है। उसका ऐसे गायब हो जाना समझ नहीं आ रहा। कहाँ चली गयी। पता नहीं। वह पास नहीं है। ये पता है। रात करीब साढ़े दस हो रहे होंगे जब लैपटॉप बंद किया। ऊपर आया। सीढ़ियों पर अँधेरा था। रोज़ की तरह। उन पर चप्पलों की आवाज़ आ रही थीं। रोज़ की तरह।...