ब्लॉगसेतु

अजय  कुमार झा
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इस बीच खबर ये आ रही है कि , नराधम ,कृतघ्न ,लालची और महास्वार्थी धूर्त देश चीन के विरुद्ध विश्व भर के देश लामबंद हो रहे हैं . अंतर्राष्ट्रीय अदालत में अब तक अलग अलग कुल सात देशों ने वाद संस्थापित कर दिए हैं और अमेरिका ब्रिटेन जापान दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने चीन को...
अजय  कुमार झा
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अभी 1 मार्च को विख्यात ब्लॉगर दीदी रेखा  श्रीवास्तव जी द्वारा ब्लॉगरों के अधूरे सपनों को शब्दों के ताने बाने में बुनकर पुस्तक के रूप में संकलित कर प्रकाशन किये जाने और उसे पाठकों के लिए उपलब्ध करवाने का अनौपचारिक कार्यक्रम जब भाई राजीव तनेजा (यहाँ बिना संजू भा...
अजय  कुमार झा
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पहला दिन : बंदी से पहले और बंदी वाले पहले दिन लोगों ने दुकानों पर                         मेला लगायादूसरा दिन : दूसरा दिन ,पुलिस ने उठक बैठक करवाते मुर्गा बनाते ,लाठी         ...
अजय  कुमार झा
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यात्रा के पिछले भागों को आप यहां यहां और यहॉँ पढ़ सकते हैं          ये तो मैं आप सबको पिछली पोस्टों में बता ही चुका हूँ कि बहन और बहनोई जिनका निवास पिछले दो दशकों से उदयपुर में ही है और उन्होंने जैसे निर्देश हमें दिए उसने हमें बहुत ही सहूलिय...
अजय  कुमार झा
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भारतीय समाज प्राचीन काल से ही खुद को स्वस्थ या कहें कि चुस्त दुरुस्त रखने के लिए कभी भी विशेष प्रयत्नशील नहीं रहा है | इसका एक वाज़िब कारण यह भी था की लोगों की शारीरिक श्रम वाली दिनचर्या व चर्बी रहित  सादा मगर पौष्टिक भोजन करने की परम्परा उन्हें आतंरिक रूप से इ...
अजय  कुमार झा
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शिक्षक दिवस पर प्रकाशित एक आलेख शिक्षकों के लिए कक्षा में दो ही विद्यार्थी पसंदीदा होते हैं अक्सर , एक वो जो खूब पढ़ते लिखते हैं और हर पीरियड में सावधान होकर एकाग्र होकर उन शिक्षकों की बात सुनते समझते हैं और फिर परीक्षा के दिनों में उनके तैयार प्रश्नपत्रों को ब...
अजय  कुमार झा
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जैसे जैसे ब्लॉगिंग की तरफ लौट रहा हूँ तो देख रहा हूँ कि हिंदी ब्लॉगिंग का प्रवाह सच में ही बहुत कम हो गया है | हालत ये है की पूरे दिन में यदि पचास पोस्टें भी नज़रों के सामने से गुज़र रही हैं तो उसमें से दस तो वही पोस्टें हैं जो इन पोस्टों के लिंक्स लगा रही हैं | &nbs...
अजय  कुमार झा
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कहते हैं कि संगत का असर बहुत पड़ता है और बुरी संगत का तो और भी अधिक | बात उन दिनों की थी जब हम शहर से अचानक गाँव के वासी हो गए थे | चूंकि सब कुछ अप्रत्याशित था और बहुत अचानक हुआ था इसलिए कुछ भी व्यवस्थित नहीं था | माँ और बाबूजी पहले ही अस्वस्थ चल रहे थे | हम सब धीरे...
शिवम् मिश्रा
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पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में इतना बदलाव तो यकीनन ही आया है कि , अब लोगों को वो राजनीति स्पष्ट दिख रही है और शायद समझ भी आ रही है जिससे कभी आम लोगों का दूर दूर तक यदि वास्ता था तो सिर्फ इतना की वोटिंग वाले दिन एक छुट्टी मिलेगी | अब न सिर्फ मतदाताओं का मतद...
शिवम् मिश्रा
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सरकार ने आखिरकार आरक्षण के भूत की एक बार फिर से चुटिया पकड़ ली है | हालांकि मेरे जैसे एक साधारण व्यक्ति जो सिर्फ अपने श्रम और संघर्ष पर अपना मुकाम हासिल कर पाया के लिए किसी भी तरह का आरक्षण , ठीक उस बैसाखी की तरह है जो दो पाँव से चलने दौड़ने वाले तक को जबरन थमाया जा...