ब्लॉगसेतु

रवीन्द्र  सिंह  यादव
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ये ऊँची मीनारें  इमारतें बहुमंज़िला रहते इंसान ज़मीर से मुब्तला। वो बाढ़ क़हर न झोपड़ी न रही रोटी राहत फंड से कौन करेगा मौज़। © रवीन्द्र सिंह यादव
Aparna  Bajpai
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कविता के सिरहने पड़ी हैंकितनी अबूझ पहेलियाँ,   मेरा- तुम्हारा प्रेम,हमारे सीले दिनों की यादें,दर्द सिर पर रखे भारी समझौतों वाले दिन;और कविता के पैताने!वो हाँथ जोड़ कर बैठना,कि एक दिन लौट आयेंगे हमारे भी दिन,टपकना बंद हो जाएगा बरसात का पानी बच्चे के सिर...
PRABHAT KUMAR
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पर झोपड़ी के घर कितना सूकून नहीं होता बर्बादी आबादी का नाम नहीं होता और जीवन में सफलता ही सब नहीं होता गूगल साभार किस्से हज़ार होते है सोने के महलों के पर झोपड़ी के घर कितना सूकून नहीं होता  तरसती है आँखें बस खुशियों के आंसू की हर किसी को इसका ही एहसास...
मधुलिका पटेल
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सोच रहा हूँ आज अपने गाँव लौट लेगांवों में अब भी कागा मुंडेर पर नज़र आते हैंउनके कांव - कांव से पहुने घर आते हैं पाँए लागू के शब्दों से होता है अभिनंदनआते ही मिल जाता है कुएँ का ठंडा पानी और गुड़ धानीनहीं कोइ सवाल क्यों आए कब जाना है नदी किनारे गले मे...