ब्लॉगसेतु

anup sethi
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पिछले कुछ महीनों में पूना में भारतीय फिल्‍म टेलिविजन संस्‍थान में तीन चार बार जाने का मौका मिला। कालेज यूनिवर्सिटी छोडे़ हुए करीब तीन दशक हो गए हैं। उसके बाद ऐसी जगहों पर जाने का खास मौका नहीं मिला। रस्‍मी तौर पर या मेहमान की तरह तो कभी कभार जाना हुआ, पर आम आदमी क...
anup sethi
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पिछले दिनों हमारे एक चचेरे भाई का फोन आया कि वे मुंबई पहुंच गए हैं, कई दिन के सफर के कारण बच्‍चे बडे़ सभी बीमार पड़ गए हैं और रात को ही लौट भी जाना है, इसलिए घर नहीं आ पाएंगे। चाची जी के लिए कुछ सामान लाए थे, यहीं छोड़ रहे हैं, तुम आ कर ले जाना। सुबह का वक्‍त था।...
 पोस्ट लेवल : हिमाचल टिप्पणी लोक
anup sethi
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पिछले दिनों जयपुर लिटरेचर फेस्टिबल में आशीष नंदी के एक बयान से शुरू हुआ विवाद मीडिया में दूध में बाल की तरह उफना जिससे जरा सी तपन हुई और दुनिया उसी रफतार से चलती रही. इस तरह की घटनाओं का घटित होना हमारे समय में हो रहे आमूल परिवर्तनों के लक्षणों के उभर आने के जैसा ह...
anup sethi
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पिछले दिनों जयपुर लिटरेचर फेस्टिबल में आशीष नंदी के एक बयान से शुरू हुआ विवाद मीडिया में दूध में उबाल की तरह उफना जिससे जरा सी तपन हुई और दुनिया उसी रफतार से चलती रही. इस तरह की घटनाओं का घटित होना हमारे समय में हो रहे आमूल परिवर्तनों के लक्षणों के उभर आने के जैसा...
anup sethi
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छायांकन - हरबीर यह लेख कुछ वर्ष पहले शिखर संस्‍था द्वारा हिमाचल की युवा रचनाशीलता पर आयोजित संगोष्‍ठी‍ में पढ़ा गया था. हाल में यह स्‍वाधीनता के शारदीय विशेषांक में छपा है. इस बीच आत्‍मारंजन का काव्‍यसंग्रह पगडंडियां गवाह हें भी आ गया है और अजेय के संग्रह की घोषणा...
विजय राजबली माथुर
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 फर्जीवाड़ा क्यों समझने के लिए यह विवरण देखें- मेरे इस लिंक पर प्रस्तुत लेख- http://vidrohiswar.blogspot.in/2012/09/blog-post_14.htmlपर 'एंटी वाइरस' नाम से किसी अज्ञात ने टिप्पणी दी जबकि टिप्पणी बाक्स के साथ स्पष्ट घोषणा है की,-"ढोंग-पाखंड को बढ़ावा देने वाली...
ललित शर्मा
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अजय  कुमार झा
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ब्लॉगिंग में जितना आकर्षण ब्लॉग पोस्टों का रहा है शुरू से लगभग उतना ही उन पर दर्ज़ टिप्पणियों का भी रहा है । और यकीन मानिए कभी कभी तो शायद उससे भी ज्यादा । वैसे भी मुझे तो जितना पोस्टें अपनी ओर खींचती हैं उतनी ही प्रभावित टिप्पणियां भी करती हैं । ऐसा लगता है मानो आज...
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anup sethi
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मैं बचपन में गांव में था तो स्कूल की कोई याद नहीं है, कब लगता था कब छूटता था। बस आना जाना भर याद है। रास्ते में एक खड्ड पड़ती थी। जंगल था। झाड़ियां थीं। उनमें फल होते थे। जंगली बेर होते थे। यही सब याद है। घर में ट्रक के टायर से निकाले हुए रबड़ के सख्त चक्के को 'गड्...
 पोस्ट लेवल : टिप्पणी अंतर्नाद
अजय  कुमार झा
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पिछले कुछ समय में अक्सर अंतर्जालीय मित्रों के बीच एक बात बार बार उठी कि , हिंदी ब्लॉग जगत में पहले तो पाठकों की और अब टिप्पणी करने वाले पाठकों का रुझान कम हो रहा है । नहीं जानता कि ऐसा क्या सब महसूस कर रहे हैं । टिप्पणियों का आकर्षण और उनका अपना महत्व हमेशा से ही र...
 पोस्ट लेवल : टिप्पणी चर्चा